गोरा बड दयार ठाकुर
परम दयालु गौर अब संकीर्तन के बादलों से प्रेम की भारी वर्षा करा रहे हैं।
सखाओं के समूह के मध्य वे अत्यन्त शोभायमान हैं। उनका अद्भुत रूप सभी लोकों को प्रकाश से भर देता है।
नृत्य करते हुए वे कितनी ही सुन्दर भाव-भंगिमाएँ प्रकट करते हैं! उनका सुन्दर नृत्य देखकर कौन अपने हृदय को शान्त रख सकता है?
करताल और मृदंग बज उठते हैं। मधुर गीत गाए जाते हैं, वे गीत अमृत की तरंगों के समान हैं।
कोई हँसता है, कोई रोता है, कोई भूमि पर गिर पड़ता है। कोई भी शान्त नहीं रहता।
पृथ्वी और आकाश "जय" की ध्वनि से गूँज उठते हैं। पतित और तुच्छ नरहरि दास भी आनन्द से उन्मत्त हो जाते हैं।