गोरा मोर दयार अबधि गुण निधि
मेरे गौर प्रभु दया के महान भण्डार हैं। नदिया के नगरों में और गंगा के तट पर गौरांग निरन्तर लीला करते हैं।
अब गौर प्रभु में चलने की शक्ति नहीं रह गई है। उनकी भुजाएँ भक्तों के कन्धों पर टिकी हैं। "हरिबोल" कहते हुए वे रोते हैं।
उनके नेत्रों से प्रेम के अश्रुओं की कितनी ही नदियाँ बहती हैं! उनके शरीर के रोम पुलकित हो उठते हैं। अब उनमें धरती पर खड़े रहने की भी शक्ति नहीं रह गई है।
वे निरन्तर अपने सखाओं के साथ नृत्य करते हैं। "हरि! हरिबोल!" वे कीर्तन करते हैं। मित्रों के कन्धों पर भुजाएँ रखकर वे कठिनता से चलते हैं।
वे सभी लोकों को प्रेम के अमृत से भर देते हैं। उनका नाम पतित-पावन है। परमानन्द बड़ी श्रद्धा से उनकी महिमा सुनते हैं। परमानन्द के हृदय में उनके सिवा और कोई नहीं ठहरता।