हो'ये विषये आवेश, पे'ले, मन, जातना अशेष
हे मेरे मन! भौतिक इन्द्रिय-भोग के वश में पड़कर तूने अपने ऊपर अनंत कष्ट ला लिया है। व्रज-धाम में राधा-श्याम का संग छोड़कर तू इस संसार में आ गया और अनेक पीड़ाओं को सहता रहा।
माया देवी के बंदीगृह में फँसकर और अपने पुराने कर्मों के वश में असहाय होकर घूमते हुए, कठोर और तुच्छ श्रम में लगे-लगे तेरा जीवन बीत गया। भौतिक शरीर में डूबकर, 'मैं' और 'मेरा' की भावना से भरकर, तू केवल जड़ पदार्थों के प्रति आकर्षण और द्वेष का अनुभव करता है।
तू वास्तव में चिदानंद स्वरूप है, जिसका सुख केवल कृष्ण-सेवा में ही है। हाय, तू पाँच भौतिक तत्त्वों अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के हाथों में पड़ गया है, और उनकी पकड़ में एक असहाय भेड़ के समान बन गया है। परन्तु अब तेरे उद्धार का अंतिम उपाय साधुओं का संग है, जहाँ चित्तत्त्व की चर्चा होती है।
स्त्रियों का सांसारिक संग और भोग-सुख के लिए धन जोड़ने के प्रयास, हे मेरे प्रिय भाई! इस तुच्छ खेल को त्याग दो! चाँद बाउल की शुद्ध सलाह स्वीकार करो, अशुद्ध बाउल संप्रदायों से जुड़ी सारी छलपूर्ण प्रवृत्तियाँ त्यागकर शुद्ध भक्ति-रस की धारा में प्रवेश करो।