केनो भेकेर् प्रयास्?
वेश बदलने की इतनी इच्छा क्यों है? समय से पहले गृहस्थ का वेश छोड़कर त्यागी का वेश धारण करने से सब कुछ नष्ट हो जाता है। जब चित्त पहले शुद्ध होता है, तभी बुद्धि तत्त्व को समझती है, और तब वेश-परिवर्तन अपने समय पर स्वयं ही प्रकट हो जाता है।
परन्तु जब कोई बनावटी प्रयास से साधु का वेश धारण करता है, तो अंत में इस अनुचित वेश की पीड़ा में ही नष्ट हो जाता है। इस प्रकार वह नेड़ा-नेड़ी संप्रदाय का सदस्य कहलाता है, नगर में भीख माँगता फिरता है, और अखाड़े नामक स्थान पर रहता है। ऐसा निकम्मा व्यक्ति, असमय का कद्दू, अंततः अपनी आत्मा का सारा हित नष्ट कर देता है।
शुकदेव गोस्वामी, नारद मुनि और चार कुमार जैसे महान ऋषि ही त्यागी का वेश धारण करने के सच्चे अधिकारी हैं। उनके समान वेश धारण करने की इच्छा तभी करनी चाहिए जब कोई उनके समान वैराग्य प्राप्त कर ले। बताओ, केवल वेश धारण करने से इन महर्षियों जैसी बुद्धि और शुद्ध हृदय किसे प्राप्त हो सकता है?
आत्मा और अनात्मा का सच्चा विवेक रखते हुए, हृदय में ही त्यागी का वेश धारण करो, और भजन-साधना की वर्षा से सींचकर अपनी प्रेम-लता को खिला दो। चाँद बाउल कहते हैं, जब ऐसा होगा, तभी तुम सचमुच भगवान कृष्ण के सेवक बन सकोगे।