किबा खोल करताल बाजे
खोल और करताल बज रहे हैं। प्रभु के सहचर चारों ओर उपस्थित हैं।
अब भक्तगण प्रभु की लीलाओं के मधुर गीत गाते हैं। इन गीतों को सुनकर पत्थर और सूखी लकड़ी भी पिघल जाते हैं।
सुंदर भगवान गौर नृत्य के मंडल में नाचते हैं। उनमें कैसा भाव भरा है? कौन जान सकता है?
उनके रोम रोम पुलकित हो उठे हैं। उनका शरीर सुवर्ण के समान चमकता है।
उनके नेत्रों से अश्रुओं की गंगा प्रवाहित होती है।
अपनी बाहें उठाकर वे गर्जना करते हैं, हरि! हरि!
किसी पतित पापी को देखकर वे उसे बार-बार गले लगाते हैं।
वे एक के बाद एक व्यक्ति को प्रेम का धन देते हैं। केवल दीन नरहरि को वह धन नहीं देते।