Nandgram Dham
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कृष्ण नाम धरे कोतो बल्

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कृष्ण-नाम धरे कोतो बल् विषय-वासनानले, मोर चित्त सदा ज्वले, रवि-तप्त मरु-भूमि-सम् कर्न-रन्ध्र-पथ दिया, हृदि माझे प्रवेशिया, वरिषोय सुधा अनुपम्
अर्थ

कृष्ण के नाम में कितनी शक्ति है? मेरा हृदय सांसारिक वासनाओं की अग्नि में निरन्तर जलता रहता है, ठीक सूर्य से झुलसी हुई मरुभूमि के समान। पवित्र नाम मेरे कानों के छिद्रों से होकर मेरे हृदय में प्रवेश करता है और मेरी आत्मा पर अनुपम अमृत की वर्षा करता है।

हृदोय होइते बोले, जिह्वार अग्रेते चले, शब्द-रूपे नाचे अनुक्षन् कन्ठे मोर भङ्गे स्वर, अङ्ग कांपे थर थर, स्थिर होइते ना पारे चरण्
अर्थ

पवित्र नाम मेरे हृदय के भीतर से बोलता है, मेरी जिह्वा के अग्रभाग पर आता है, और दिव्य ध्वनि के रूप में उस पर निरन्तर नृत्य करता है। मेरा कण्ठ अवरुद्ध हो जाता है, मेरा शरीर तीव्रता से काँपने लगता है, और मेरे पैर अनियन्त्रित रूप से हिलने लगते हैं।

चक्षे धारा, देहे घर्म, पुलकित सब चर्म, विवर्न होइलो कलेवर मूर्छित होइलो मन्, प्रलयेर आगमन्, भावे सर्व-देह जर जर
अर्थ

मेरी आँखों से अश्रुओं की धाराएँ बहती हैं। मेरे शरीर से पसीना छूटता है। मेरा शरीर आनन्द से पुलकित हो उठता है, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं और मेरी त्वचा पीली पड़कर विवर्ण हो जाती है। मेरा मन मूर्छित हो जाता है और मुझे प्रलय जैसा अनुभव होने लगता है। परमानन्द की बाढ़ में मेरा सम्पूर्ण शरीर छिन्न-भिन्न हो जाता है।

कोरि' एतो उपद्रव, चित्ते वर्षे सुधा-द्रव, मोरे डारे प्रेमेर सागरे किछु ना बुझिते दिलो, मोरे तो’ बातुल कोइलो, मोर चित्त-वित्त सब हरे
अर्थ

ऐसा आनन्दमय उपद्रव मचाते हुए, पवित्र नाम मेरे हृदय पर तरल अमृत की वर्षा करता है और मुझे भगवद्-प्रेम के सागर में डुबो देता है। वह मुझे कुछ भी समझने नहीं देता, क्योंकि उसने मुझे सचमुच पागल बना दिया है और मेरा हृदय तथा मेरी सारी सम्पत्ति चुरा ली है।

लोइनु आश्रोय जा’र्, हेनो व्यवहार ता’र्, वर्निते ना पारि ए सकल् कृष्ण-नाम इच्छा-मोय्, जाहे जाहे सुखी होय्, सेइ मोर सुखेर सम्बल्
अर्थ

जो अब मेरा एकमात्र आश्रय हैं, उनका व्यवहार ऐसा ही है। मैं इसका पूरा वर्णन कर पाने में सक्षम नहीं हूँ। कृष्ण का पवित्र नाम स्वतन्त्र है और इसलिए अपनी ही इच्छा से कार्य करता है। वे जिस प्रकार सुखी होते हैं, वही मेरे सुख का साधन भी है।

प्रेमेर कलिका नाम्, अद्भुत रसेर धाम्, हेनो बल करये प्रकाश् ईषत् विकशि’ पुनः, देखाय् निज-रूप-गुन, चित्त हरि’ लोय कृष्ण-पाश्
अर्थ

पवित्र नाम दिव्य प्रेम के पुष्प की कली है, भक्ति के अद्भुत रसों का धाम है। उसकी शक्ति ऐसी है कि यद्यपि वह अपनी शक्ति का किंचित् मात्र ही प्रकट करता है, फिर भी वह अपने दिव्य रूप और गुणों को प्रकट कर देता है, मेरा हृदय हर लेता है और उसे कृष्ण के पास ले जाता है।

पूर्न विकशित होइया, ब्रजे मोरे जाय लोइया, देखाय् मोरे स्वरूप-विलास् मोरे सिद्ध-देह दिया, कृष्ण-पाशे राखे गिया, ए देहेर कोरे सर्व-नाश्
अर्थ

पूर्ण रूप से प्रकट होकर, पवित्र नाम मुझे व्रज ले जाता है और अपनी प्रेम-लीला मुझे दिखाता है। वह मुझे मेरा अपना दिव्य, नित्य शरीर प्रदान करता है, मुझे कृष्ण के समीप रखता है, और मेरे इस नश्वर शरीर का सम्पूर्ण नाश कर देता है।

कृष्ण-नाम-चिन्तामणि, अखिल रसेर खनि, नित्य-मुक्त शुद्ध-रस-मोय् नामेर बालाइ जत, सब लो’ये होइ हत, तबे मोर सुखेर उदोय्
अर्थ

कृष्ण का नाम चिन्तामणि है, समस्त भक्ति-रसों की खान है, नित्य मुक्त और शुद्ध रस का साक्षात् स्वरूप है। जब पवित्र नाम के शुद्ध कीर्तन में आने वाली सभी बाधाएँ दूर होकर नष्ट हो जाएँगी, तभी मेरे सुख का सच्चा उदय होगा।