Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

मनेर् माला जप्बि जखन्, मन

मनेर् माला जप्बि जखन्, मन, केनो कोर्बि बाह्य विसर्जन मने मने भजन् जखन् होय्, प्रेम उथ्ले पडे' बाह्य-देहे व्याप्त हो'ये रोय् आबार् देहे चरे, जपाय् कोरे, धराय् माला अनुक्षण
अर्थ

हे मेरे मन! जब तू मन के भीतर माला जपता है, तो बाहर से जप करना क्यों छोड़ देता है? जब मन के भीतर भजन होता है और सचमुच प्रेम का उदय होता है, तब बाहरी शरीर भी उन्हीं भावों से भर जाता है। इसीलिए शरीर हिलने-डुलने लगता है, और साथ ही निरंतर माला भी फिरती रहती है।

जे व्याटा भण्ड-तापस होय्, बक-बिडाल देखा'ये बाह्य निन्दे अतिशोय् निजे जुत पे'ले कामिनी-कनक कोरे सदा संघटन
अर्थ

मन में ही जप करने की यह गलत प्रवृत्ति पाखंडी त्यागियों की है। बगुले और बिल्ली की कहानी में जैसे दिखाया गया है, ऐसा त्याग अत्यंत निंदनीय है। बाहर से ऐसा गुण दिखाते हुए भी, जब कभी स्त्री और धन भोगने का अवसर मिलता है, वह बार-बार उसमें लिप्त हो जाता है।

से व्याटार् भितोर फक्काकार्, बाह्य-साधन-निन्दा बोइ आर् आछे किबा ता'र् (निजेर्) मन भालो देखा-ते गिये निन्दे साधु-आचरण
अर्थ

ऐसे मनुष्य के भीतर केवल छल की खाली गुहा होती है। बाहरी साधना-भक्ति की सीधी निंदा के अतिरिक्त उसके पास कहने को और क्या है? वह अपनी ही मन की उपज को 'श्रेष्ठ' दिखाने का स्वांग करता है, और साथ ही सच्चे साधुओं के आचरण की खुलेआम निंदा करता है।

शुद्ध कोरि' भितोर बाहिर, भाइ, हरि-नाम् कोर्ते थाको, तर्के काज् नाइ, (शुष्क) तोमार् तर्क कोर्ते जीवन जा'बे चाँद-बाउल् ताय् दुःखी हो'नो
अर्थ

हे प्रिय भाई! भीतर और बाहर दोनों से स्वयं को शुद्ध करो। हठपूर्वक विवादास्पद बातें बकने के बजाय हरिनाम के जप में लगे रहो। जब तुम अपना जीवन शुष्क तर्क-वितर्क में बिता देते हो, तब चाँद बाउल को बड़ा दुःख होता है।

इस भजन के बारे में

ग्रन्थ
बाउल संगीत
पद
4