मनेर् माला जप्बि जखन्, मन
हे मेरे मन! जब तू मन के भीतर माला जपता है, तो बाहर से जप करना क्यों छोड़ देता है? जब मन के भीतर भजन होता है और सचमुच प्रेम का उदय होता है, तब बाहरी शरीर भी उन्हीं भावों से भर जाता है। इसीलिए शरीर हिलने-डुलने लगता है, और साथ ही निरंतर माला भी फिरती रहती है।
मन में ही जप करने की यह गलत प्रवृत्ति पाखंडी त्यागियों की है। बगुले और बिल्ली की कहानी में जैसे दिखाया गया है, ऐसा त्याग अत्यंत निंदनीय है। बाहर से ऐसा गुण दिखाते हुए भी, जब कभी स्त्री और धन भोगने का अवसर मिलता है, वह बार-बार उसमें लिप्त हो जाता है।
ऐसे मनुष्य के भीतर केवल छल की खाली गुहा होती है। बाहरी साधना-भक्ति की सीधी निंदा के अतिरिक्त उसके पास कहने को और क्या है? वह अपनी ही मन की उपज को 'श्रेष्ठ' दिखाने का स्वांग करता है, और साथ ही सच्चे साधुओं के आचरण की खुलेआम निंदा करता है।
हे प्रिय भाई! भीतर और बाहर दोनों से स्वयं को शुद्ध करो। हठपूर्वक विवादास्पद बातें बकने के बजाय हरिनाम के जप में लगे रहो। जब तुम अपना जीवन शुष्क तर्क-वितर्क में बिता देते हो, तब चाँद बाउल को बड़ा दुःख होता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- बाउल संगीत
- पद
- 4