मानुष भजन् कोर्छो, ओ भाइ, भावेर् गान् धोरे'
हे मेरे प्रिय भाइयों! तुम मनुष्यों के शरीर की पूजा करते हो, और फिर भी भाव के गीत गाने का दुस्साहस करते हो। तुम अपने गुप्त कर्मों को बड़ी चतुराई से छिपाते हो, परन्तु वे सब यमराज की सभा में पूरी तरह प्रकट हो जाएँगे।
स्त्रियों को हिजड़ा और पुरुषों को नपुंसक मानने वाला ही कर्ता-भजा संप्रदाय का सदस्य कहलाता है। इस विकृत विचार की आड़ में तुम इन्द्रिय-भोग में लगे रहते हो, और इस तरह अपने ही मन को भ्रमित कर लेते हो।
हे भाइयों, तुम्हारे मुख से 'गुरु सत्य है' यह निकलता है, फिर भी तुम भौतिक भोग-सुख में डूबे रहते हो। तुम खुलेआम ईर्ष्यालु अभक्तों का संग करते हो, तो फिर तुम शुद्ध कैसे हो पाओगे?
स्त्रियों के संग और धन के लोभ में डूबकर जीव का मन बहुत विचलित हो जाता है, पर क्या सच्चा बाउल इन सांसारिक चीज़ों की चमक से आकर्षित होता है? पतंगा आग को देखकर उसकी ओर दौड़ता है और उसी में गिरकर मर जाता है।
चाँद बाउल बड़ी विनम्रता से कहते हैं, ये सब पतनकारी बातें छोड़कर शुद्ध भाव से 'हरि' नाम का जप करो। तब तुम निश्चय ही संसार-सागर के पार चले जाओगे।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- बाउल संगीत
- पद
- 5