नाचत गौर नटन पण्डित बर
नृत्य के महान पण्डित भगवान गौर नृत्य करते हैं। उनका रूप कुंकुम और विद्युत की चमक को भी लजा देता है। उनके रोम रोम का पुलकित होना ही उनका अनुपम आभूषण है।
उनके होंठ लाल हैं। उनका सुन्दर मुखचन्द्र चमकता है। उनके दाँत कुन्द के फूल हैं। उनकी कोमल मुसकान अमृत की झरती धारा है। उनके अमृत-भरे कमल-नेत्र लोगों को आनन्द देते हैं। वे कितने सैकड़ों कामदेवों का गर्व हर लेते हैं!
वे अपनी दोनों भुजाएं उठाते हैं, जो सुवर्ण-कमल की नाल को भी लजा देती हैं। वे हरि! हरि! का जाप करते हैं। उनका हृदय प्रेमभाव से अभिभूत हो जाता है। उनके कोमल और सुंदर चरण समस्त मंगल से भरे हैं। पृथ्वी अनेक प्रकार से सेवा करते हुए उनके चरणों को धारण करती है।
खोल और खमक कितनी तालों में बजते हैं! प्रभु के दिव्य सहचर मधुर-मधुर गीत गाते हैं। भगवान् गौर संसार को प्रेम का अनमोल उपहार खुले हाथों देते हैं। वे उस उपहार से संसार को भर देते हैं। केवल दुष्ट-हृदय, अधम नरहरि को वह उपहार नहीं मिला। केवल वही ठगा गया।