नाचत गौर परम सुख सदना
परम सुख के धाम भगवान गौर नृत्य करते हैं। उनके रोम रोम पुलकित हो उठे हैं। उनका सुंदर तेजोमय रूप कामदेव के गर्व को चूर कर देता है।
अपने चमकते, लाल कमल की पंखुड़ियों जैसे नेत्रों से वे कृपा-दृष्टि डालते हैं। उनका मुसकाता मुख शरद के चन्द्रमा को भी लजा देता है। उनके वचन शोभामय हैं। उनके सुन्दर दाँत हृदय को मोह लेते हैं।
उनकी सुंदर गति सुंदर गजराजों के गर्व को भी हर लेती है। उनके चरणों को धारण करने का सौभाग्य पाकर पृथ्वी नित नए आनंद का अनुभव करती है। प्रेमभाव से हृदय भरकर वे गद्गद स्वर में कहते हैं, हरि! हरि! वे भाव के लक्षण प्रकट करते हैं।
आनंद-उन्मत्त होकर वे प्रेम के बहुमूल्य रत्न मुक्त हाथों से बांट देते हैं। वे समस्त विपत्तियों को हर लेते हैं। समस्त लोक उनकी महिमा से भर जाते हैं। वे सबकी इच्छा पूर्ण करते हैं। केवल नरहरि की इच्छा पूर्ण नहीं होती। नरहरि का इस संसार में जन्म और जीवन निष्फल एवं दयनीय है।