नाचत गौर पूरब रसे भोर
कृष्णरूप में अपनी पूर्व लीलाओं के रस का आस्वादन करते हुए भगवान गौर नृत्य करते हैं। उनके चमकते अंग, जो सुमेरु पर्वत के गर्व को चूर करते हैं, कामदेव के मन को मोहित कर लेते हैं।
उनके मधुर मधुर मुसकाते मुख की छटा भयानक पापों के अंधकार को नष्ट कर देती है। उनके ताल में नाचते चरणों की गति से पृथ्वी कांप उठती है। पृथ्वी में उनका भार सहने की शक्ति नहीं है।
उनके नये लाल कमल जैसे नेत्रों से प्रेम के आँसू लगातार उमड़ते रहते हैं। उनके शरीर के रोम खड़े हैं। सिंह के पराक्रम को भी मात देते हुए वे गरजते हैं। डरकर बलवान कलियुग भाग जाता है।
उनके प्रिय सहचर सुंदरता से खोल और करताल बजाते हुए गाते हैं। उनका गर्जनशील संगीत आकाश को भेद देता है। अब समस्त लोक प्रेमोन्माद में डूब गए हैं। नरहरि कहते हैं, अब भगवान गौर की उज्ज्वल निर्मल महिमा सब लोकों को भर देती है।