नाचत गौरचन्द्र नट भूप
नर्तकों के राजा भगवान गौरचन्द्र नृत्य करते हैं। उनका सुंदर रूप समस्त लोकों के हृदय को आनंदित करता है। वे लाखों कामदेवों के गर्व को चूर चूर कर देते हैं।
प्रेमभाव से अभिभूत होकर वे गर्जना करते हैं। वे अद्भुत रूप से तेजोमय और गौरवशाली हैं। पृथ्वी अब उनके मंगलमय चरणों को धारण करती है। उनकी दीर्घ भुजाएं सुंदर हैं।
उनके होंठों की मुसकान मधुर और सुन्दर है। उनका शोभामय मुख शरद के चन्द्रमा को भी हरा देता है। उनके लाल कमल की पंखुड़ियों जैसे नेत्र चंचल हैं। उनमें प्रेम का कितना अमृत चमकता है!
भक्तगण नित नए मधुर गीत गाते हैं, ऐसे गीत जो किन्नरों के गर्व को हर लेते हैं। प्रेम का सागर अब समस्त लोकों को जलमग्न कर देता है। सभी उस सागर में तैरते हैं। केवल दुष्ट-हृदय नरहरि उसमें नहीं तैरता। वह सागर उसे कभी छू नहीं पाया, वह उससे दूर ही रह गया।