नाचत शची तनय गौर माधुरी मन मोहे
शची के सुंदर गौरवर्ण पुत्र नृत्य करते हैं। वे हर हृदय को मोहित कर लेते हैं। उनका रूप सुमेरु पर्वत की शोभा को भी लजा देता है। उनके रोम रोम पुलकित हो उठे हैं।
उनके मधुर मुसकाते मुखचन्द्र की चमक अमृत बरसाती है। उनके चंचल नेत्रों के कोनों से कितना चमकता अमृत बहता है!
नाचते हुए उनके तलवे ताल देते हैं। उनके नूपुर छनछनाते हैं। उनकी नित नई सुन्दर भंगिमाएँ देखकर कामदेव लज्जित हो जाता है।
आनंद की बहती नदी में डूबकर संसार के लोग उनकी महिमा का गान करते हैं। नरहरि उस महिमा-गान से ठगा गया है। दीन-दुखी नरहरि जन्म-मृत्यु की ज्वाला में जलता रहता है।