नाचये चैतन्य चिन्तामणि
चिन्तामणि-स्वरूप चैतन्य नाचते हैं। उनके वक्ष से मोतियों की माला के समान आँसुओं की धारा बहती है।
प्रेम से गद्गद होकर वे धरती पर लोट जाते हैं। वे हुंकार भरते हैं और क्षणभर में उठकर खड़े हो जाते हैं।
बाहें ऊँची उठाकर वे बार-बार मण्डल बनाकर नाचते हैं। वे पतित जनों को भी 'हरि! हरि!' पुकारने के लिये प्रेरित कर देते हैं।
वे प्रतिक्षण हरि-नाम का कीर्तन और जप करते हैं। उनके इन विरल प्रेम-लक्षणों को कोई नहीं समझ सकता।
संसार के लोग उनकी अपार महिमा के गीत गाते हैं। वासु रामानन्द उस प्रेम-धन को पाने की आकांक्षा करते हैं, जिसे वे बाँट रहे हैं।
इस भजन के बारे में
- भाव
- पद
- 5