सिंह द्वार त्यजि गोरा समुद्र आडे धाय
सिंहद्वार को छोड़कर श्री गौर समुद्र की ओर दौड़ते हैं। "कृष्ण कहाँ हैं? कृष्ण कहाँ हैं?" वे पुकारते हैं।
चारों ओर से घेरकर भक्तजन श्री हरि की महिमा गाते हैं। श्री गौर धूल में लोटते हुए स्वर्ण पर्वत के समान हो गए हैं।
श्री गौर भूमि पर गिर पड़ते हैं। उनका ऊँचा शरीर अब मूर्च्छित है।
वे पीठ के बल पड़े हैं। उनके मुख से झाग निकलता है। अब वासुदेव घोष का हृदय टुकड़ों में बिखर जाता है।