श्री शचीतनयाष्टक
मैं शची के महिमामय पुत्र को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। उनका रूप दीप्तिमान और तेजस्वी है। उनका रूप सदा दिव्य प्रेमानन्द से दमकता रहता है। उनकी कृपा का एक अत्यन्त छोटा कण भी तीनों लोकों को पवित्र कर देता है।
मैं शची के महिमामय पुत्र को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। प्रेमानन्द से भरकर वे रुँधे गले से टूटे-टूटे शब्द बोलते हैं। उनकी ऊँची गर्जना असुरों को फटकारती है। उनकी कृपा जन्म-मृत्यु के संसार का सारा भय चूर-चूर कर देती है।
मैं शची के महिमामय पुत्र को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। वे गेरुए वस्त्र धारण करते हैं। उनके गाल सुन्दर हैं। उनके हाथों और पैरों के चमकते नाखून अनेक चन्द्रमाओं को भी मात देते हैं। वे अपने ही गुणों और अपने ही पवित्र नामों का कीर्तन करने की लीला में आनन्द लेते हैं।
मैं शची के महिमामय पुत्र को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। उनके कमल-नेत्रों से आँसुओं की धारा बह रही है। प्रेमानन्द के नए अमृत-रस के लक्षणों के आभूषणों से वे सजे हैं। धीमी और सुन्दर चाल से चलते हुए वे नृत्य की लीला करते हैं।
मैं शची के महिमामय पुत्र को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। उनके चंचल चरणों की चाल सुन्दर है। उनके टखनों के नूपुर मधुर झंकार करते हैं। उनका शीतल मुख चन्द्रमा को भी तिरस्कृत कर देता है।
मैं शची के महिमामय पुत्र को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। उनकी कमर की डोरी में कमण्डलु और दण्ड टिके हैं। उनका शरीर दिव्य और तेजस्वी है। उनका सिर मुण्डित है।
मैं शची के महिमामय पुत्र को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। उनके केश धूल से सजे हैं। उनके बिम्बफल जैसे सुन्दर होंठ काँप रहे हैं। उनके माथे पर चन्दन के लेप का तिलक चमक रहा है।
मैं शची के महिमामय पुत्र को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। उनके नेत्र लाल कमल की पंखुड़ियों को भी तिरस्कृत करते हैं। उनकी सुन्दर भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं। उनका किशोर शरीर नर्तक का वेश धारण किए है।
इस भजन के बारे में
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- पद
- 8