व्रजे प्रसिद्धं नवनीत (चौराष्टकम्)
मैं उन चोर-शिरोमणि को प्रणाम करता हूँ, जो व्रज में माखन-चोर के नाम से प्रसिद्ध हैं, जो गोपियों के वस्त्र चुराते हैं, और जो अपनी शरण में आने वालों के अनेक जन्मों में इकट्ठे हुए पाप चुरा लेते हैं।
मैं उन चोर-शिरोमणि को प्रणाम करता हूँ, जो श्रीमती राधिका का हृदय चुराते हैं, जो नए वर्षा-मेघ की साँवली कान्ति चुरा लेते हैं, और जो अपने चरणों की शरण लेने वालों के सारे पाप और दुःख चुरा लेते हैं।
वे अपने शरणागत भक्तों को कंगाल बना देते हैं और उन्हें बेघर होकर भटकने वाले भिखारी बना देते हैं। अहो! ऐसा भयंकर चोर तीनों लोकों में न कभी देखा गया, न सुना गया।
उनका नाम लेने मात्र से मनुष्य के पापों का पहाड़ भी धुल जाता है। ऐसा आश्चर्यजनक और अद्भुत चोर मैंने कहीं भी न कभी देखा, न सुना!
हे चोर! मेरा धन, मेरा मान, मेरी इन्द्रियाँ, मेरे प्राण और मेरा सब कुछ चुराकर अब आप भागकर कहाँ जा सकते हैं? मैंने आपको अपनी भक्ति की रस्सी से पकड़ लिया है।
आप यमराज का भयानक फंदा काट देते हैं, आप भौतिक संसार का डरावना फंदा तोड़ देते हैं और आप सबके भौतिक बन्धन काट डालते हैं, परन्तु अपने ही प्रेमी भक्तों द्वारा बाँधी गई गाँठ को आप नहीं काट पाते।
हे मेरा सब कुछ चुराने वाले! हे चोर! आज मैंने आपको अपने हृदय के दुःख भरे कारागार में बंद कर दिया है, जो मेरे अज्ञान के घोर अन्धकार के कारण बहुत भयानक है। वहाँ आप बहुत लंबे समय तक रहेंगे और अपनी चोरी के अपराधों का उचित दण्ड पाते रहेंगे!
हे कृष्ण, मेरा सब कुछ चुराने वाले चोर! मेरी भक्ति का फंदा सदा कसा रहेगा और आप मेरे हृदय के कारागार में ही रहते रहेंगे, क्योंकि लाखों कल्पों तक भी मैं आपको नहीं छोड़ूँगा।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- बिल्वमंगल ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- पद
- 8
- रिकॉर्डिंग
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री, इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।