चैतन्य-चरितामृत की मध्य-लीला जगन्नाथ पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन के एक महान वार्षिक दृश्य का वर्णन करती है। यह रथ-यात्रा थी, जिसमें जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा के विग्रहों को उनके रथों पर जुलूस में खींचा जाता था। महाप्रभु अपने भक्तों के साथ कीर्तन करते हुए उनके सामने नृत्य करते थे। कृष्णदास कविराज गोस्वामी लिखते हैं कि जुलूस शुरू होने से पहले भगवान् ने स्वयं गायकों को चार अलग-अलग दलों में बाँटा, और हर गायक का नाम उसके स्थान के साथ बताया। गोविन्द दत्त इन चार दलों में से पहले दल में थे। वे उन पाँच व्यक्तियों में से एक थे, जिन्हें प्रमुख गायक की पुकार का उत्तर देने, यानी उसकी पंक्तियाँ दोहराने, के लिए चुना गया था।
| विशेष | विवरण |
|---|---|
| ग्रन्थ-सन्दर्भ | श्री चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 13.32-38 |
| कुल व्यवस्था | चार कीर्तन-दल, कुल चौबीस गायक और आठ मृदंग-वादक |
| प्रथम दल के प्रमुख गायक | स्वरूप दामोदर गोस्वामी |
| प्रथम दल में पंक्तियाँ दोहराने वाले गायक | दामोदर पण्डित, नारायण, गोविन्द दत्त, राघव पण्डित, गोविन्दानन्द |
| प्रथम दल के लिए नियुक्त नर्तक | अद्वैत आचार्य |
| द्वितीय दल के प्रमुख गायक | श्रीवास ठाकुर |
दो प्रमुख गायक, चार दल #
चैतन्य-चरितामृत कहती है कि रथों के चलने से पहले महाप्रभु ने स्वयं वहाँ एकत्र कीर्तन करने वालों को माला और चन्दन दिया। उन्होंने उनमें से स्वरूप दामोदर गोस्वामी और श्रीवास ठाकुर को दो प्रमुख गायक बनाया। कुल चौबीस गायक थे, जो चार दलों में बँटे थे। हर दल के साथ दो मृदंग-वादक भी जोड़े गए। इस प्रकार कुल बत्तीस व्यक्ति थे। ग्रन्थ के अनुसार भगवान् ने पहले स्वयं सोचा कि उन्हें कैसे बाँटा जाए, और उसके बाद ही यह व्यवस्था की। चैतन्य-चरितामृत में ऐसा बहुत कम होता है कि कीर्तन करने वालों की पूरी सूची केवल सामान्य वर्णन के रूप में नहीं, बल्कि नाम सहित दी गई हो। इसी कारण गोविन्द दत्त जैसे कम प्रसिद्ध भक्त का नाम भी ग्रन्थ में आता है।
प्रथम दल के गायक और नर्तक #
स्वरूप दामोदर को पहले दल का प्रमुख बनाया गया। कृष्णदास कविराज गोस्वामी उनकी पंक्तियाँ दोहराने वाले पाँच गायकों के नाम सीधे बताते हैं: दामोदर पण्डित, नारायण, गोविन्द दत्त, राघव पण्डित, और गोविन्दानन्द। ये वही गोविन्दानन्द हैं, जिनका नाम आदि-लीला की भक्त-सूची में पहले गोविन्द दत्त के साथ आया था। इस अंश पर श्रील प्रभुपाद की टीका एक और बात जोड़ती है: स्वयं अद्वैत आचार्य को इस पहले दल का नर्तक बनाया गया था। इसके बाद श्रीवास ठाकुर को प्रमुख गायक बनाकर दूसरा दल बनाया गया। महाप्रभु स्वयं स्वरूप दामोदर को कीर्तन और रस, दोनों का अधिकारी मानते थे। इसलिए उनकी पंक्तियाँ दोहराने के लिए चुने गए केवल पाँच लोगों में नाम आना सचमुच सम्मान की बात है। चैतन्य-चरितामृत यह नहीं बताती कि गोविन्द दत्त को यह स्थान कैसे मिला। वह केवल इतना बताती है कि यह स्थान उनका था।
जो ग्रन्थ नहीं बताता #
चैतन्य-चरितामृत इस विशेष रथ-यात्रा का कोई वर्ष नहीं देती। महाप्रभु ने अपने जीवन के अन्तिम लगभग अठारह वर्षों तक हर वर्ष पुरी में यह उत्सव मनाया। इसलिए केवल ग्रन्थ के आधार पर इस दृश्य को किसी एक निश्चित वर्ष से नहीं जोड़ा जा सकता। ग्रन्थ यह भी नहीं बताता कि गोविन्द दत्त दूसरे वर्षों में भी इसी पहले दल में गाते थे या नहीं, या हर रथ-यात्रा में यह व्यवस्था बदलती थी या नहीं। लेकिन एक बात निश्चित है। कम-से-कम एक बार गोविन्द दत्त उन पाँच गायकों में खड़े थे, जो स्वरूप दामोदर की पंक्तियाँ दोहरा रहे थे। उस दल में अद्वैत आचार्य ने नृत्य किया था। कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने कीर्तन करने वालों की इस सूची को इतना महत्त्वपूर्ण समझा कि उन्होंने इसमें एक-एक गायक का नाम लिखा। इस एक उत्सव के अलावा गोविन्द दत्त कौन थे, इसके बारे में मुख्य जीवनी-पृष्ठ पर कुछ अधिक जानकारी दी गई है, हालाँकि वह भी बहुत कम है। उसमें उनके गृह-श्रीपाट, महाप्रभु की बड़ी भक्त-सूची में उनके स्थान, और उनके नाम वाले दो अन्य भक्तों के बारे में एक स्पष्ट टिप्पणी है।

