Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi
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टेक्स्ट
रागेर भजन-पथ कहि एबे अभिमत लोक-बेद-सार एइ बानी सखीर अनूगा हञा ब्रजे सिद्ध-देह पाञा एइ भाबे जूडाबे परानी
अर्थ

अब मैं राग-मार्ग के भजन की विधि बताता हूँ, जैसा मुझे उचित लगता है। यह वाणी लोक और वेद दोनों का सार है। सखियों की अनुगामी बनकर, व्रज में सिद्ध-देह पाकर, इसी भाव से सेवा करने पर प्राण शीतल होंगे।

श्री राधिकार सखी जत ताहा बा कहिब कत मूख्य सखी करिये गणन ललिता बिशाखा तथा सूचित्रा चम्पकलता रङ्गदेवी सूदेवी कथन
अर्थ

श्री राधिका की सखियाँ अनगिनत हैं, इसलिए मैं केवल प्रमुख सखियों का वर्णन करूँगा। ललिता, विशाखा, सुचित्रा, चम्पकलता, रंगदेवी, सुदेवी...

तूङ्गबिद्या इन्दूरेखा एइ अष्ट-सखी लेखा एबे कहि नर्म–सखी गण इहोँ सेबा सह चरी प्रिय-प्रेष्ठ नाम धरि प्रेम सेबा करे अनूक्षण
अर्थ

तुंगविद्या और इन्दुरेखा, ये आठ सखियाँ प्रमुख सखियाँ कहलाती हैं। ये श्री राधिका की सबसे प्रिय सहचरियाँ हैं और सदा गहरे प्रेम से राधा-कृष्ण की सेवा करती हैं। ये राधा-कृष्ण से अत्यंत घनिष्ठ रूप से जुड़ी हैं।

सम स्नेहा बिषम स्नेहा ना करिह दूइ लेख कहि मात्र अधिक स्नेहा गण निरन्तर थाके सन्गे कृष्ण कथा लीला रन्गे नर्म सखी एइ साब जन
अर्थ

समान स्नेह वाली (सम-स्नेहा) और असमान स्नेह वाली (विषम-स्नेहा), इन दोनों प्रकार की सखियों को यहाँ न गिनो। मैं केवल अधिक स्नेह वाली (अधिक-स्नेहा) सखियों का वर्णन करता हूँ। वे सदा राधा-कृष्ण के साथ रहती हैं और कृष्ण-कथा तथा उनकी लीला के आनन्द में डूबी रहती हैं। इन सभी को नर्म-सखी कहा जाता है।

श्री-रूप-मञ्जरी सार श्री-रति-मञ्जरी आर लबङ्ग-मञ्जरी मञ्जूलली श्री-रस-मञ्जरी-सङ्गे कस्तुरिका-आदि रङ्गे प्रेम-सेबा करे कूतूहली
अर्थ

श्री रूप मञ्जरी सबमें श्रेष्ठ हैं। श्री रति मञ्जरी, लवंग मञ्जरी, मञ्जुलाली, श्री रस मञ्जरी, कस्तूरिका आदि उनके साथ बड़े उत्साह और आनन्द से प्रेम-सेवा करती हैं।

ए-सभर अनूगा हैञा प्रेम-सेबा निब चाञा इङ्गिते बूझिब सब काजे रूप गूण दगमगि सदा हब अनूरागी बसति करिब सखी माझे
अर्थ

इन सखियों का अनुगमन करते हुए मैं उनसे प्रेम-सेवा की भिक्षा माँगूँगा और उनके संकेत से ही सारी सेवाएँ समझ लूँगा। राधा-कृष्ण के रूप और गुणों से मैं सदा मोहित और अनुरक्त रहूँगा, और सखियों के बीच निवास करूँगा।

बृन्दाबने दुइ जन चरि-दिके सखी-गण समयेर सेबा रस सूखे सखीर इङ्गित हबे चमर धूलाब तबे ताम्बूल जोगाब चाँद-मूखे
अर्थ

वृन्दावन में राधा-कृष्ण दोनों के चारों ओर सखियाँ रहती हैं और समय पर आनंदपूर्वक सेवा करती हैं। सखी का संकेत मिलने पर मैं चामर डुलाऊँगा और उनके चन्द्रमुख में ताम्बूल दूँगा।

जूगल-चरण सेबि निरण्तर एइ भाबि अणूरागे थाकिब सदाय साधने भाबिब जाहा सिद्ध-देहे पाब ताहा राग पथेर एइ से उपाय
अर्थ

इस प्रकार सोचते हुए मैं निरंतर युगल-चरणों की सेवा करूँगा और सदा प्रेमपूर्ण अनुराग में रहूँगा। साधन के समय जो भाव मन में रहेगा, वही सिद्ध-देह में प्राप्त होगा। राग-मार्ग की यही विधि है।

साधने जे धन चाइ सिद्ध-देहे ताहा पाइ पक्व पक्व मात्र से बिचार पाकिले से प्रेम-भक्ति अपक्वे साधन रीति भकति-लक्षण-तत्त्व सार
अर्थ

साधना के समय जो धन चाहा जाता है, वही सिद्ध-देह में प्राप्त होता है। यह केवल परिपक्व और अपरिपक्व अवस्था का भेद है। अपरिपक्व अवस्था में इसे साधन-भक्ति अर्थात् नियमित भक्ति कहते हैं, और परिपक्व होने पर यही प्रेम-भक्ति कहलाती है। यही भक्ति के लक्षण और तत्त्व का सार है।

नरोत्तम दासे कहे एइ जेन मोर हये ब्रज-पूरे अणूरगे बास सखी-गण-गणनाते आमारे गणिबे ताते तबहुँ पूरिब अभिलाष
अर्थ

नरोत्तम दास कहते हैं: मेरे साथ ऐसा हो कि मैं अनुराग के साथ व्रज में निवास करूँ, और सखियों की गिनती में मुझे भी गिना जाए। तभी मेरी अभिलाषा पूरी होगी।

तथा हि सखीनं सङ्गिनी-रूपाम् अत्मानं वासना-मयीम् आज्ञा-सेवा-परं तत्-तत् कृपलन्कार-भुसिताम्
अर्थ

इसके अतिरिक्त, साधक को इस प्रकार चिन्तन करना चाहिए: 'मैं अपनी भावना के अनुरूप सखियों की एक संगिनी हूँ। उनकी आज्ञा के अनुसार सेवा में लगी रहती हूँ, और उनकी कृपा के आभूषणों से सजी हूँ।'

कृष्ण स्मरन् जनं चास्य प्रेष्ठं निज-समीहितम् तत्-तत्-कथा-रतश् चासौ कुर्याद् वासं व्रजे सदा
अर्थ

साधक को सदा कृष्ण का स्मरण करना चाहिए, और कृष्ण के किसी प्रिय सेवक को, जो उसे अपने मन के अनुकूल लगे, चुनना चाहिए। उस सेवक और कृष्ण की प्रेम-कथाओं में लीन रहकर साधक को सदा व्रज में निवास करना चाहिए। यदि शरीर से व्रज जाना संभव न हो, तो मन से वहाँ निवास करना चाहिए। (भक्तिरसामृतसिन्धु १.२.२९४)