आजु गोरा नगर कीर्तने
अपने प्रिय पार्षदों से घिरे हुए, गौर प्रभु नगर में संकीर्तन करते हैं।
उनका सुसज्जित रूप अत्यन्त शोभायमान है। नाना प्रकार की भाव-भंगिमाओं से नृत्य करते हुए वे सारे संसार के मन को मोहित कर लेते हैं।
वे निरन्तर प्रेम की वृष्टि करते हैं। नदिया में वे आनन्द की एक नदी बहा देते हैं।
देवगण मनुष्यों के बीच मिल जाते हैं। उनके मन आनन्द से भरे हैं। वे कितनी ही बार फूलों की वर्षा करते हैं!
नगर के लोग दौड़ पड़ते हैं। वे अपने मन से गौर प्रभु का गुणगान करते हैं।
कुछ मूढ़ लोग, भय से जिनका मन विचलित हो जाता है, इस गर्जनकारी कीर्तन को सिंहों की दहाड़ समझ बैठते हैं।
लाखों-लाखों जगमगाते दीप जलते हैं। धरती और आकाश को भर देने वाले उस प्रकाश की मैं किससे तुलना करूँ?
नरहरि क्या कहें? वे नहीं जानते। सारा संसार आनन्द से उन्मत्त हो गया है। अब किसी के भी मन को शान्ति नहीं है।