आजु कि आनन्द सङ्कीर्तने
आज इस संकीर्तन में कितना आनंद उपस्थित है! अपने प्रिय सहचरों से घिरे हुए, परम आनंद के मूल भगवान गौर और भगवान नित्यानन्द नृत्य करते हैं।
वे नाचते हुए पुकारते हैं, 'जय! जय!' भक्त खोल और करताल बजाते हैं। सभी प्रेम में विभोर हैं। सबकी आँखों से आँसुओं की नदियाँ उमड़कर बहती हैं। कोई आनन्द से गाता है, कोई भाव में विभोर होकर धरती पर गिर पड़ता है।
किसी के शरीर के रोम खड़े हो जाते हैं। कोई ऊँचे स्वर में गरजता है। कोई काँपने लगता है। कोई शान्त और स्थिर नहीं रह पाता। कोई भगवान् गौर की ओर देखता है। कोई अपनी बाहें फैलाकर दूसरे भक्तों को गले लगा लेता है और छोड़ता ही नहीं।
कोई भक्तों के चरण पकड़कर उनकी चरण-धूलि अपने सिर पर रखता है। कोई चलते चलते ठोकर खाकर बार बार भूमि पर गिर जाता है। दोनों प्रभुओं को नृत्य करते देखकर सेवक नरहरि आनंदित होकर दोनों प्रभुओं की महिमा का गान करते हैं।