Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

आजु पूर्णिमा साज समये राहु शशी गरासि

आजु पूर्णिमा साज समये राहु शशी गरासि गौरचन्द्र उदये भबहि तापतम बिनाशि
अर्थ

इस समय पूर्णिमा है। राहु चन्द्रमा को निगल रहा है। गौर प्रभु रूपी चन्द्रमा उदित होता है। अब सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं।

प्रफुल्लित सब भक्त-हृदय धिरज ना धरु को-इ सीता-पति नियडे चलत अति उनमत हो-इ
अर्थ

भक्तों के हृदय आनन्द से खिल उठते हैं। कोई भी शान्त नहीं है। अद्वैत आचार्य निकट आते हैं। वे आनन्द से उन्मत्त हैं।

घन घन हुङ्कारत अद्वैत परम धीर बिलसत प्रिय-गण सह ग्रहणे सुरधुनी-तीर
अर्थ

साधु-स्वभाव वाले अद्वैत आचार्य गर्जना करते हैं। ग्रहण के समय गंगा के तट पर वे अपने साथियों के साथ लीलाएँ करते हैं।

मङ्गल कल-रब सब नदीया-पुर भरि भेल कौतुके को-इ जानत नाहि कैछे रजनी गेल
अर्थ

नदिया के सभी नगर मंगल-ध्वनियों से भर गए हैं। रात के अँधेरे में कोई किसी को पहचान नहीं पाता।

मिश्र-भबन शोभा शुभ सम्पद सुख बाढि आयत बहु लोक कोन यत भबन छाडि
अर्थ

जगन्नाथ मिश्र का घर सौन्दर्य, तेज, ऐश्वर्य और आनन्द से भरा है। अपने-अपने घर छोड़कर सब लोग वहाँ जाते हैं।

बायत मृदु-बाद्य सरस बादक मुद माति गायक-गण गान-निपुण गायत कत भान्ति
अर्थ

वाद्यों का संगीत मधुर है। सभी वादक आनन्द से उन्मत्त हैं। निपुण गायक कितने महिमामय गीत गाते हैं?

नर्तक कृत नृत्य तात्ता थै ताथै उचारि निर्मल यश भणत भाट भङ्गी भर बिथारि
अर्थ

नर्तक नाचते हैं। ताल के बोल पुकारते हैं: “थै ताथै!” कवि प्रभु की निर्मल महिमा का वर्णन करने वाले मनोहर शब्द सुनाते हैं।

याचक मन तोषि मिश्र देत उचित दान निरुपम नबनीत रङ्ग निरखत घनश्याम
अर्थ

उचित दान देकर जगन्नाथ मिश्र याचकों के मन को सन्तुष्ट करते हैं। घनश्याम उस अनुपम शिशु को निहारते हैं, जो नए मक्खन जैसा गोरा है।

इस भजन के बारे में

पद
8