आजु पूर्णिमा साज समये राहु शशी गरासि
इस समय पूर्णिमा है। राहु चन्द्रमा को निगल रहा है। गौर प्रभु रूपी चन्द्रमा उदित होता है। अब सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं।
भक्तों के हृदय आनन्द से खिल उठते हैं। कोई भी शान्त नहीं है। अद्वैत आचार्य निकट आते हैं। वे आनन्द से उन्मत्त हैं।
साधु-स्वभाव वाले अद्वैत आचार्य गर्जना करते हैं। ग्रहण के समय गंगा के तट पर वे अपने साथियों के साथ लीलाएँ करते हैं।
नदिया के सभी नगर मंगल-ध्वनियों से भर गए हैं। रात के अँधेरे में कोई किसी को पहचान नहीं पाता।
जगन्नाथ मिश्र का घर सौन्दर्य, तेज, ऐश्वर्य और आनन्द से भरा है। अपने-अपने घर छोड़कर सब लोग वहाँ जाते हैं।
वाद्यों का संगीत मधुर है। सभी वादक आनन्द से उन्मत्त हैं। निपुण गायक कितने महिमामय गीत गाते हैं?
नर्तक नाचते हैं। ताल के बोल पुकारते हैं: “थै ताथै!” कवि प्रभु की निर्मल महिमा का वर्णन करने वाले मनोहर शब्द सुनाते हैं।
उचित दान देकर जगन्नाथ मिश्र याचकों के मन को सन्तुष्ट करते हैं। घनश्याम उस अनुपम शिशु को निहारते हैं, जो नए मक्खन जैसा गोरा है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- घनश्याम दास
- पद
- 8