जगन्नाथ मिश्रेर भबने
जगन्नाथ मिश्र के घर में मंगलमय वाद्य बज रहे हैं।
स्त्रियाँ संस्कार के लिए आई हैं। कवि अनेक कविताएँ पढ़ रहे हैं।
एक शुभ घड़ी में शची के पुत्र यज्ञोपवीत धारण करते हैं।
इस यज्ञोपवीत के समान और कौन-सा यज्ञोपवीत हो सकता है? यह यज्ञोपवीत तो स्वयं भगवान अनन्त हैं, जो अत्यन्त सूक्ष्म रूप में प्रकट हुए हैं।
अब सिर पर बाल नहीं रहे, और प्रभु का मुख मधुर तथा मनोहर लग रहा है। क्या वे सबका चित्त चुराते हैं या नहीं चुराते?
वे केसरिया वस्त्र पहने हैं। वे दसों दिशाओं को प्रकाश से भर देते हैं।
चारों ओर ब्राह्मणों की सभा है। उसके बीच में ब्राह्मणों के राजा भगवान गौर विराजमान हैं।
उनके हाथ में ब्रह्मचारी-दण्ड है और कंधे पर भिक्षा की झोली है। उन्हें देखकर कौन शान्त और उदासीन रह सकता है?
वे स्वयं भगवान वामन के समान सुशोभित हैं। उनकी हर भंगिमा सब लोकों के हृदयों को मोह लेती है।
वे धीरे से मुस्कुराकर मधुर वचन बोलते हैं। भक्तों के पास जाकर वे भिक्षा माँगते हैं।
सब उनकी ओर देखते हैं। अपने हृदय में वे अपने प्राण ही उन्हें भिक्षा में दे देते हैं। मन में बिना किसी भय के वे उन्हें भिक्षा अर्पित करते हैं।
मनुष्यों की स्त्रियों की भीड़ में घुलमिलकर देव-नारियाँ भगवान गौर के चन्द्रमा जैसे मुख को निहारती हैं। वे भी उन्हें भिक्षा देती हैं।
कौन अपना पूरा जीवन उन्हें समर्पित करके भगवान गौर की उपासना नहीं करता? सब लोग “जय!” की ध्वनि करते हैं।
घनश्याम कहते हैं: अब जगन्नाथ मिश्र के घर में आनन्द का सागर उमड़ रहा है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- घनश्याम दास
- पद
- 14