आहा मरि मरि देख आङ्खि भरि
अहा! अहा! अपनी आँखें भरकर देख लो! तीनों लोकों को मोहित करने वाले इन रूपों को देखो! अद्वैत आचार्य को देखो, समस्त आनन्द के मूल नित्यानन्द प्रभु को देखो और प्रेमरस के राजा चैतन्य महाप्रभु को देखो!
उनके मुखों की शोभा चमकते चन्द्रमा को भी मात दे देती है। वे कामदेव का गर्व हर लेते हैं। उनकी मृदु-मृदु मुस्कान से अमृत की धारा बरसती है, अमृत की मूसलाधार वर्षा होती है।
वे तेजस्वी हैं। उनके तिलक चमक रहे हैं। उनके नेत्र और भौहें सुन्दर हैं। उनकी शोभायमान सुन्दर भुजाएँ उनके वक्ष के दोनों ओर विराजमान हैं, और वह वक्ष मुनियों के हृदय को भी आकर्षित करता है।
उनके गले में अनेक प्रकार के फूलों की मालाएँ सुशोभित हैं। उनके वस्त्र सुन्दर हैं। उनके चरणों के अरुण तलवे घनश्याम के हृदय में शोभा के साथ विराजमान हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- घनश्याम दास
- पद
- 4