भब सागर बर दुरतर दुरग्रह
बार-बार होने वाले जन्म और मृत्यु का सागर भयानक और विशाल है। संसार के लोग उसमें डूब रहे थे। पतित जीव व्याकुल थे। कोई भी तैरकर किनारे तक नहीं पहुँच पाता था।
जय हो, जय हो गौर प्रभु और निताई प्रभु की, जो इस संसार में अवतरित हुए! दया करके डूबते जीवों को उठाकर उन्होंने उन्हें भगवान कृष्ण के पवित्र नामों की मज़बूत नाव में बिठाया और उनका उद्धार किया।
ब्रह्मा, शिव, व्यास, शुकदेव, नारद तथा सभी देवता और ऋषि भी प्रेम के उस सागर का किनारा नहीं पा सके। गौर प्रभु और निताई प्रभु ने पतित लोगों को प्रेम का दान दिया। उनके जैसी असीम करुणा और किसमें है?
क्या फिर कभी उनके जैसा कोई और अवतार होगा? वे रसिक भक्तों के समूह से घिरे रहते थे। उन्हें याद करके दीन घनश्याम व्याकुल हो जाता है। उसे ऐसा लगता है मानो उसके हृदय में भाला घोंप दिया गया हो।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- घनश्याम दास
- पद
- 4