आरे मोर नाचत गौर किशोर
अरे! मेरे गौर-किशोर नाचते हैं! स्वर्ण की चमक को भी लजाता हुआ उनका सुन्दर रूप दसों दिशाओं को प्रकाशित कर देता है।
शरद के चन्द्रमा को भी हरा देने वाला उनका मुख झिलमिलाता है। रोचन-तिलक से सजा उनका सुन्दर माथा शोभा पाता है। क्या उनके सिर के घुँघराले, इधर-उधर लहराते काले केश किसी पीले कमल के चारों ओर मँडराते काले भौंरों का झुंड हैं?
उनकी नासिका तिल के फूल-सी है, अधर बिम्ब फल-से हैं। उनके शरीर पर पसीने की बूँदें झलक रही हैं। नये अरुण कमल को भी लजाते उनके नेत्रों से आँसुओं की अविरल धारा बहती रहती है।
अपने साथियों के साथ संकीर्तन में वे अपने ही स्वरूप की महिमा प्रकट कर गाते हैं। खोल और करताल बज उठते हैं। अब पापियों के पाप चूर-चूर हो जाते हैं।
अब सारी पृथ्वी आश्चर्य से भर गई है। शची-पुत्र, जो पतितों के उद्धारक हैं, इस संसार में अवतरित हुए हैं। रामानन्द दास अत्यन्त दीन-हीन और मूढ़-बुद्धि है। हे प्रभु, मुझे संसार-सागर के पार कर दीजिए।