भज गोविन्दं
हे मूर्ख! गोविन्द का भजन करो, गोविन्द का भजन करो, गोविन्द का भजन करो। मृत्यु के समय व्याकरण के नियम तुम्हारी रक्षा नहीं करेंगे।
हे मूर्ख! धन बटोरने की प्यास छोड़ दो। मन को वैराग्य और सत्य के विचार में लगाओ। अपने ही कर्म से जो कुछ तुम्हें मिले, उसी से मन को सन्तुष्ट रखो।
किसी स्त्री के उन्नत वक्ष और नाभि को देखकर मोह और वासना की इच्छाओं में मत फँसो। ये मांस और चर्बी आदि के विकार मात्र हैं। इस बात को बार-बार अपने मन में याद करो।
जैसे कमल के पत्ते पर पड़ी जल की बूँद अस्थिर और काँपती रहती है, वैसे ही इस संसार में जीवन अत्यन्त अस्थिर और चंचल है। निश्चय जानो कि सारा संसार दुःखों से भरा है, रोग और अभिमान से जकड़ा हुआ है और शोक से पीड़ित है।
जब तक मनुष्य धन कमाकर परिवार का पालन करने में समर्थ है, तब तक उसके घर के सब लोग उससे स्नेह रखते हैं। पर जब बुढ़ापे से उसका शरीर जर्जर होकर लड़खड़ाने लगता है, तब घर में कोई उससे एक बात तक नहीं पूछता।
जब तक मनुष्य जीवित रहता है, घर के लोग प्रेम से उसकी कुशल पूछते हैं। पर जब प्राणवायु रुक जाती है और जीव शरीर से चला जाता है, तब उसकी पत्नी भी उस शव से डरकर भाग जाती है।
बचपन खेल-कूद की आसक्ति में बीत जाता है। जवानी स्त्री की आसक्ति में खो जाती है। बुढ़ापा चिन्ता और घबराहट में, अनेक बातों को सोचते हुए बीतता है। पर परब्रह्म में आसक्त होना चाहने वाला कोई विरला ही है।
सज्जनों (साधुओं) की संगति से अनासक्ति आती है, अनासक्ति से मोह से छुटकारा मिलता है, मोह से छूटने पर तत्त्व का निश्चल बोध होता है, और तत्त्व का बोध होने पर जीवन्मुक्ति मिलती है, अर्थात् जीते जी आत्मा की मुक्ति।
जवानी बीत जाने पर कामवासना कैसी? पानी सूख जाने पर तालाब किस काम का? धन चला जाने पर परिवार के लोग कहाँ? सत्य का ज्ञान हो जाने पर संसार (जन्म-मृत्यु का चक्र) कैसा?
धन, मित्रों और यौवन का गर्व मत करो। काल इनमें से हर एक को पल भर में हर लेता है। माया से रचे इस संसार के भ्रम से अपने को मुक्त करो और ब्रह्म के पद को, कालातीत सत्य को, जानकर प्राप्त करो।
दिन और रात, सन्ध्या और प्रातः, शिशिर और वसन्त बार-बार आते और जाते हैं। शाश्वत काल खेलता रहता है और आयु घटती जाती है, फिर भी मनुष्य इच्छा की आँधी को नहीं छोड़ता।
बारह श्लोकों का यह पुष्प-गुच्छ एक वैयाकरण को सर्वज्ञ शंकर ने सुनाया, जिन्हें भगवत्पाद कहकर पूजा जाता है।
अरे पागल! धन और प्रिया की चिन्ता में क्यों लगा है? क्या तेरा कोई मार्गदर्शक नहीं है? तीनों लोकों में केवल सज्जनों की संगति (सत्संग) ही वह नाव है जो बार-बार के जन्म-मरण के सागर से पार ले जा सकती है। (यह श्लोक पद्मपाद का माना जाता है।)
कोई जटाधारी है, कोई सिर मुँड़ाए है, कुछ ने अपने बाल नोंच डाले हैं, कुछ गेरुए वस्त्र पहने हैं और कुछ रंग-बिरंगे वेश धरे घूमते हैं। सच तो यह है कि ये सब वेश केवल पेट के लिए हैं। सत्य सामने प्रकट होने पर भी मूर्ख इन अनेक वेशों के पार नहीं देख पाते। (यह श्लोक तोटकाचार्य का माना जाता है।)
बूढ़े के शरीर की शक्ति चली गई है, सिर गंजा हो गया है, मसूड़े दाँतों से खाली हैं, और वह बैसाखी के सहारे चलता है। फिर भी वह अपनी आसक्ति नहीं छोड़ता और व्यर्थ आशाओं और इच्छाओं से मजबूती से चिपका रहता है। (यह श्लोक हस्तामलक का माना जाता है।)
तपस्वी सामने आग और पीठ पर सूर्य से शरीर को गर्माता है। रात में ठण्ड से बचने के लिए घुटनों के बीच मुँह छिपाए पेड़ के नीचे रहता है। हाथों में भिक्षा का अन्न लेता है, फिर भी इच्छा और वासना के फन्दे को नहीं छोड़ता। (यह श्लोक सुबोध का माना जाता है।)
कोई उस संगम की तीर्थयात्रा करे जहाँ गंगा नदी समुद्र से मिलती है (गंगासागर), व्रत रखे या दान दे, फिर भी सच्चे ज्ञान के बिना सभी [मतों] के अनुसार उसे सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं मिलती। (यह श्लोक वार्तिककार का माना जाता है।)
जो मन्दिरों में या पेड़ों की जड़ के पास रहता है, जिसकी शय्या भूमि है, वस्त्र मृगचर्म है और जिसने सब सांसारिक वस्तुओं के भोग का त्याग कर दिया है, ऐसे वैराग्य से भला किसे सुख नहीं मिलेगा? (यह श्लोक नित्यानन्द का माना जाता है।)
कोई योग (परमात्मा से मिलन) में रमा हो या भोग (सांसारिक सुख) में, संग में रमा हो या एकान्त में, पर जिसका मन ब्रह्म (आध्यात्मिक सत्य) में रमता है, केवल वही सच्चा आनन्द पाता है और तृप्त होता है, और कोई नहीं। (यह श्लोक आनन्दगिरि का माना जाता है।)
जो मनुष्य भगवद्गीता का थोड़ा-सा भी पाठ करे, गंगाजल की एक बूँद भी पिये और मुरारी, अर्थात् “मुरा” के शत्रु (भगवान कृष्ण), की एक बार भी पूजा करे, उसका यमराज से सामना नहीं होता। (यह श्लोक दृढ़भक्त का माना जाता है।)
फिर जन्म, फिर मृत्यु, फिर माता के गर्भ में शयन! इस अपार संसार-सागर (जन्म-मृत्यु का बार-बार चलने वाला चक्र) को पार करना सचमुच बहुत कठिन है। हे मुरारी! अपनी अहैतुकी कृपा से मेरी रक्षा कीजिए (इस जन्म-मरण के चक्र से)। (यह श्लोक नित्यनाथ का माना जाता है।)
जिसका गुदड़ी जैसा वस्त्र सड़क पर फेंके हुए चीथड़ों से बना है, जिसने पुण्य और पाप दोनों को त्यागकर अपना मार्ग इनसे मुक्त कर लिया है और जिसका मन योग में (परमात्मा से मिलन में) लगा है, वही योगी सुख से अभिभूत उन्मत्त बालक की तरह (दिव्य आनन्द में) रमता है। (यह श्लोक नित्यनाथ का माना जाता है।)
इस संसार को सारहीन जानकर और स्वप्न की छाया के समान मानकर त्याग दो, फिर भली-भाँति विचार करो: मैं कौन हूँ? तुम कौन हो? मैं कहाँ से आया हूँ? मेरी माता कौन है और पिता कौन? (यह श्लोक सुरेन्द्र का माना जाता है।)
मित्र और शत्रु, पुत्र और सम्बन्धियों का प्रेम पाने या उनसे लड़ने में अपने प्रयत्न व्यर्थ मत करो। सबमें अपने सच्चे आत्मा को देखो और भेद की सब भावना को पूरी तरह छोड़ दो। (यह श्लोक मेधातिथि का माना जाता है।)
काम, क्रोध, लोभ और मोह को छोड़कर अपने सच्चे आत्मा को जानने का प्रयास करो और विचार करो: मैं कौन हूँ? जो मूर्ख आत्मज्ञान से रहित हैं और अज्ञान से ढके हैं, वे नरकों में तपाए जाते हैं। (यह श्लोक भारतीवंश का माना जाता है।)
नियमित रूप से गीता का पाठ करो, हृदय में विष्णु (श्रीपति) का ध्यान करो और उनके सहस्र नामों (विष्णुसहस्रनाम) का गान करो। सज्जनों और पवित्र लोगों के साथ रहने में आनन्द लो। अपना धन दीन और जरूरतमन्दों को दान में दो। (यह श्लोक सुमति का माना जाता है।)
मनुष्य बड़ी आसानी से कामभोग में लग जाता है, पर बाद में, हाय, शरीर में रोग आ जाते हैं। संसार में अन्तिम शरण मृत्यु ही है, यह जानते हुए भी मनुष्य पाप का आचरण नहीं छोड़ता।
धन को सदा अनर्थ का कारण समझो। सच यह है कि उससे रत्ती भर भी सुख नहीं मिलता। धनवानों को तो अपने पुत्र से भी भय रहता है। धन की यही रीति सर्वत्र निश्चित है।
श्वास का नियन्त्रण (प्राणायाम) और इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाने (प्रत्याहार) का अभ्यास करो, नित्य और अनित्य के भेद पर विचार करो, भगवान के पवित्र नामों के जप के साथ ध्यान करो। इन सबको बड़ी सावधानी और अत्यन्त ध्यान से करो!
हे गुरु के चरण-कमलों के प्रति निष्ठा से समर्पित भक्त! तुम शीघ्र ही संसार, अर्थात् जन्म-मृत्यु के चक्र, से मुक्त हो जाओ। इन्द्रियों और मन के संयम से तुम अपने हृदय में बसे प्रभु का दर्शन (अनुभव) करोगे!
इस प्रकार व्याकरण के नियमों में खोया हुआ एक मूर्ख वैयाकरण श्रीमान् शंकराचार्य के शिष्यों द्वारा उसकी संकीर्ण दृष्टि से शुद्ध किया गया और उसे प्रकाश दिखाया गया।
हे मूर्ख! गोविन्द का भजन करो, गोविन्द का भजन करो, गोविन्द का भजन करो। भगवान के नामों का जप करने के सिवा इस संसार-सागर को पार करने का कोई और उपाय हमें नहीं दिखता।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- आदि शंकराचार्य
- ग्रन्थ
- और भजन
- पद
- 35
- रिकॉर्डिंग
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।