भाले गौर गदाधरेर आरति
श्रीश्री गौर-गदाधर की सुन्दर आरती को निहारते हुए, मैं नदिया में आने से पूर्व की उनकी उन लीलाओं में प्रवेश करता हूँ। मैं आश्चर्यचकित रह जाता हूँ।
गोपियों से घिरे हुए वह किशोर-किशोरी युगल कल्पवृक्ष के नीचे मणि-सिंहासन पर विराजमान हैं।
उनके स्वर्ण, रत्न और गजमुक्ता के आभूषणों की तो कोई गिनती ही नहीं! उनका प्रत्येक अंग बार-बार चमक उठता है।
वे नीले मेघ और उसकी बिजली की माला के समान शोभायमान हैं। उनकी यह शोभा और महिमा तीनों लोकों को भर देती है।
शंख बज रहा है, घंटा बज रहा है, करताल बज रहे हैं। मधुर मृदंग बज रहे हैं। यह सब अत्यन्त रसमय और मधुर है।
विशाखा और अन्य सखियाँ युगल की महिमा का गान करती हैं। प्रिय-नर्म-सखियाँ उस युगल पर चामर ढुलाती हैं।
अनंग-मंजरी उस युगल को सुगन्ध और चन्दन अर्पित करती हैं। रूप-मंजरी उन्हें मालती के हार पहनाती हैं।
पंचप्रदीप और कर्पूर का दीप धारण करके सुन्दरी ललिता उस युगल की आरती करती हैं।
लक्ष्मी, पार्वती और मूर्तिमान वेद खड़े होकर गोपियों की महिमा गाते हैं। फिर वे आनन्द में भूमि पर लोटने लगते हैं।
सुरभि-कुंज में रहते हुए इस आरती को निहारकर भक्तिविनोद प्रेम और आनन्द का अनुभव करते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गीतावली
- पद
- 10
- रिकॉर्डिंग
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।