पित बरण कलि पाबन गोरा
पित-बरण कलि-पाबन गोरा
गीतावली में 69 भजन हैं, जिनके रचयिता भक्तिविनोद ठाकुर हैं, जो 13 अध्यायों में सजे हैं।
69 भजन · पृष्ठ 1 / 2
पित-बरण कलि-पाबन गोरा
तुँहु दोया-सागोर तारयिते प्राणी
श्री-कृष्ण-कीर्तने जदि मानस तोहार
प्रभु तब पद-जुगे मोर निबेदन
अनादि' करम-फले, पडि' भवार्णर जले,
अपराध-फले मम चित्त भेलो बज्र-सम
गाइते गाइते नाम कि दशा होइलो
बन्धु-गण शुनोह बचन मोर
जोग-पीठोपरि-स्थित अष्ट-सखी-सुबेष्टित
कृष्ण-भक्ति बिना कभु नाहि फलोदोय
आर केनो माया-जाले पर्डितेछो जीब-मीन
पीरिति सच्-चिद्-आनन्दे रूपबती नारी
निराकार निराकार कोरिया चित्कार
केनो आर कोरो द्वेष बिदेषि-जन-भजने
भज रे भज रे आमार मन अति मन्द
भाबना भाबना मन तुमि अति दुष्ट
भाले गौरा-गदाधरेर आरति नेहारि
(किब) जय जय गोराचान्देर् आरतिको शोभा
जय जय राधा कृष्ण जुगल-मिलन
भज भकत-वत्सल श्री-गौरहरि
यशोमती-नन्दन, ब्रज-बरो-नागर,
दोयाल् निताइ चैतन्य बोले नाच रे आमार मन
हरि बोलो हरि बोलो हरि बोलो भाइ रे
बोलो हरि बोलो (3 तिमेस्)
(हरे) हरये नमः कृष्ण जादबाय नमः
भाइ-रे!
भाइ रे
भाइ रे
भाइ रे
भाइ रे
भाइ रे
नदीया-गोद्रुमे नित्यानन्द महाजन
गाय् गोरा मधुर् स्वरे
एक्-बार् भाबो मने
'राधा-कृष्ण' बोल् बोल् बोलो रे सोबाइ
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
अङ्ग-उपङ्ग-अस्त्र-पार्षद-सङ्गे
निताइ कि नाम एनेछे रे
एलो रे गौराङ्गचान्द प्रेमे एलोथेलो
श्री-रूप-बदने श्री-सचि-कुमार
जय जय हरि-नाम चिद्-आनन्दामृत-धाम
बिश्वे उदित नाम-तपन
ज्ञानी ज्ञान-जोगे कोरिया जतने
हरि-नाम तुया अनेक स्वरूप
बाच्य ओ बाचक दुइ स्वरूप तोमार
ओहे हरि-नाम तब महिमा अपार
नारद मुनि, बाजाय् वीणा
जशोमती-स्तन्य-पायी श्री-नन्द-नन्दन
कृष्ण गोबिन्द हरे
राधा-बल्लभ माधब श्री-पति मुकुन्द
(जय) राधा-माधव (जय) कुञ्ज-बिहारी
राधा-बल्लभ राधा-बिनोद
जय जशोदा-नन्दन कृष्ण गोपाल गोबिन्द
उदिलो अरुण पूरब-भागे,
जीव् जागो, जीव् जागो, गौरचान्द बोले
राधिका-चरण-पद्म सकल-श्रेयेर सद्म
बिरजर परे शुद्ध-परब्योम-धाम
रमणी-शिरोमणि बृषभानु-नन्दिनी
रसिक-नागरी- गण-शिरोमणि
महाभाब-चिन्तामणि उद्भाबित-तनु-खानि