अर्थहीन देखि’ मोरे छेडेछे सबाइ
अर्थहीन देखि’ मोरे छेडेछे सबाइ
वृन्दावने भजन में 17 भजन हैं, जिनके रचयिता ए.सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद हैं।
वृन्दावने भजन एक बांग्ला कविता है, जिसकी रचना ए.सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद ने 1959 में वृन्दावन के श्री श्री राधा-दामोदर मन्दिर में की थी, अमेरिका जाने और इस्कॉन की स्थापना करने से कुछ वर्ष पहले। अपने जीवन का यह समय उन्होंने अधिकतर उसी मन्दिर में एकान्त अध्ययन और भक्ति-साधना में बिताया, जहाँ रूप गोस्वामी की समाधि भी है। इस साइट पर जो सत्ताईस अलग प्रविष्टियाँ दिखती हैं, वे वास्तव में यही एक लगातार चलने वाली कविता है। इसके दो-दो पंक्तियों वाले छन्द यहाँ एक अखण्ड पाठ की तरह नहीं, बल्कि एक-एक करके सूचीबद्ध किए गए हैं। इसका विषय प्रभुपाद का अपना चिन्तन है, जो उस समय के वृन्दावन के भक्त-समाज के सीधे निजी अनुभव से लिखा गया: सच्चे भजन, यानी भक्ति-साधना, और उसकी बाहरी नकल के बीच का अन्तर। इसमें झूठे वैराग्य, भौतिक लाभ के लिए कृष्ण के नाम के दुरुपयोग, और इस बात को छुआ गया है कि हरिनाम में एक वैष्णव का वास्तविक, एकाग्र लगाव सचमुच कैसा होता है। मूल पाठ श्रील प्रभुपाद की अपनी मौलिक रचना है और कॉपीराइट के अधीन है, इसलिए यह साइट यहाँ इसके वास्तविक पदों को न दोहराती है, न उनका भावार्थ देती है। जो बात सुरक्षित रूप से कही जा सकती है, वह है इसकी तिथि, रचना-स्थान और सामान्य विषय, जिनकी चर्चा नीचे दिए गए स्रोत अधिक विस्तार से करते हैं।
17 भजन
अर्थहीन देखि’ मोरे छेडेछे सबाइ
आत्मीय सबाइ भाइ, आत्मार सम्बन्धे
कत ‘प्ल्यान’ करे तारा भाल थाकिबारे
कृष्ण येइ भजे सेइ हयत’ चतुर
नामे-मात्र महाधीर, सकले अशान्त
योगीर आसने वसेछिल विश्वामित्र
कृष्णेर लागिया येबा नित्य युद्ध करे
साजिल अर्जुन येन मायाबद्ध नर
‘निर्द्वन्द्व’ वैष्णव शुधु जप करे माला
वैष्णव ना देखिया बले वैष्णव निष्क्रिय
आपनि अचरि ‘प्रभु’ जीवेरे शिखय
अतएव ताण्र नहे ‘निर्जन-भजन’
गुरुदेव बलेछिल कनिष्ठ ए-सब
देहात्मबुद्धि यार सेइ जड देह
एइ कार्य देखितेछि वृन्दावन माझ
कीर्तनेर अङ्ग शुधु नहे ढाक-ढोल
घरे वसे’ चेँचाइया पित्तवृद्धि करि