चौदिके गोबिन्द ध्वनि शुनि पहुं हासे
चारों दिशाओं से 'गोविन्द!' की ध्वनि सुनकर प्रभु गौर मुसकाते हैं। उनके अधर कँपकँपाते हैं। वे गद्गद स्वर में बोलते हैं।
आहा! गौरांग नित्यानन्द के साथ नाचते हैं, और रामानन्द गाते हैं। अब सारी पृथ्वी प्रेम के अमृत में डूब गयी है।
मुकुन्द, मुरारि और वासु गौरांग से कहते हैं, 'देखो! तुम्हारी ही महिमा सुनकर तुम्हारे प्राणों की यह नाचती पुतली अब रो रही है।'
अन्य सभी भक्त आनन्द से विभोर हो गये हैं। वासु रामानन्द नाम का प्यासा चकोर इस लीला को निहार रहा है।