एक बार करुणा कर चैतन्य निता इ
हे चैतन्य और निताई, इस बार मुझ पर कृपा कीजिए। तीनों लोकों में मेरे समान पापी कोई नहीं है।
मैं अत्यन्त मूढ़ हूँ। मैं माया का सेवक रहा हूँ। मेरा शरीर सभी पापों से भरा हुआ है।
मेरे पाप उन सभी म्लेच्छों के पापों से भी भारी हैं, उन सबसे भारी हैं जो पतित और दुराचारी हैं।
जगाई और माधाई नामक दो भाइयों ने प्रत्येक सम्भव पाप किया था, फिर भी आपने उनका उद्धार किया।
लोचन दास कहते हैं, मैं अत्यन्त पतित हूँ। आप मुझ पर कृपा क्यों नहीं करते? यदि आप मुझ पर कृपा नहीं करेंगे, तो अपनी कृपा के लिए इससे बेहतर पात्र आपको कहाँ मिलेगा?