कृष्णोत्कीर्तन गान नर्तन
कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भो-निधी
भगवान और उनके भक्तों से सीधे, हृदय से की गई विनती के भजन।
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कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भो-निधी
गोपीनाथ मम निबेदन शुनो
गौराङ्ग तुमि मोरे दया ना छाडिह
गोपीनाथ आमार उपाय नाइ
गोपीनाथ घुचाओ सोंसार-ज्वाला
चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणं
ठाकुर वैष्णव-गण करि एइ निबेदन
संसार-दावानल-लीढ-लोक
राधा-कृष्ण-सेवोन् मुञि जीवने मरणे
दीव्यद्-वृन्दारण्य-कल्प-द्रुमाधः
श्रीमान् रास-रसारम्भी वंशी-वट-तट-स्थितः
वन्दे 'हं श्री-गुरोः श्री-युत-पद-कमलं श्री-गुरुन् वैष्णवांश् च
पञ्च-तत्त्वात्मकं कृष्णं भक्त-रूप-स्वरूपकम्
तप्त-काञ्चन-गौराङ्गि राधे वृन्दावनेश्वरि
वाञ्छा-कल्पतरुभ्यश् च कृपा-सिन्धुभ्य एव च
नमो गौर-किशोराय साक्षाद्-वैराग्य-मूर्तये
गौराविर्भाव-भूमेस् त्वं निर्देष्टा सज्-जन-प्रियः
नमो भक्तिविनोदाय सच्-चिद्-आनन्द-नामिने
नम ओं विष्णु-पादाय कृष्ण-प्रेष्ठाय भू-तले
जयतां सुरतौ पङ्गोर् मम मन्द-मतेर् गती
आमि तो' दुर्जन अति सदा दुराचार
हे कृष्ण करुणा-सिन्धो
ओं अज्ञान-तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन-शलाकया
नमो महा-वदान्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते
श्री-चैतन्य-मनो-'भीष्टं स्थापितं येन भू-तले
हरि हरि कबे मोर हो'बे हेनो दिन
अरूण-कमल-दले शेष बिछाइब
कबे मुइ बैष्णबे चिनिबो हरि हरि
कबे ह'बे हेनो दशा मोर
कि-रूपे पाइब सेवा मुइ दुराचार
कृपा कोरो' बैष्णब ठाकुर
राधा-कृष्ण! निवेदन एइ जन करे
श्री-राधा-कृष्ण-पद-कमले मन
हरि हरि! कि मोर करम अभाग
अजि रसे बादर निशि
आमार एमोन भाग्य कोत दिने ह'बे
आमार समान हीन नाहि ए सोंसारे
आरे मोर आरे मोर गौराङ्ग गोसाञि
आरे मोर गौराङ्ग सोणा
एक बार करुणा कर चैतन्य निता-इ
कबे आहा गौराङ्ग बोलिया
कबे मोर मूढ मन छारि' अन्य ध्यान
कबे मोर शुभ-दिन होइबे उदोय
गौर पहुं ना भजिय मनु
गौराङ्ग पतित-पाबन तुया नाम
गौराङ्ग पातकी उद्धार करुणाय
गौराङ्ग-प्रेम-बादले डोबे सब प्रेम-जले
गौराङ्गचान्द हेर नयनेर कोणे