Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi
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बचनेर अगोचर बृन्दाबन लीला-स्तल स्वप्रकाश प्रेमानन्द-घन जाहाते प्रकट सूख नाहि जरा-मृत्यू-दूःख कृष्ण-लीला-रस अनूक्षण
अर्थ

श्री वृन्दावन, जो राधा-कृष्ण की लीलाओं का स्थल है, शब्दों से परे है। यह स्वयं-प्रकाश है और घनीभूत प्रेमानंद से पूर्ण है। वहाँ सुख सदा प्रकट रहता है, वहाँ जरा और मृत्यु का दुःख नहीं है, और कृष्ण की लीला वहाँ निरंतर होती रहती है।

राधा-कृष्ण दूँहू प्रेम लक्ष-बान येन हेम जाहार हिल्लोले रस-सिन्धू चकोर नयन-प्रेम काम-रति करे ध्यान पिरीति सूखेर दूँहे बन्धु
अर्थ

राधा-कृष्ण दोनों का प्रेम लाख बार तपाए सोने जैसा है, और उसकी लहरों में रस का सागर उमड़ता है। उनके नयन चकोर की तरह प्रेम-रस पीते रहते हैं। कामदेव और रति सदा इसी प्रेम का ध्यान करते हैं। दोनों प्रीति के सुख के बन्धु हैं।

राधिका प्रेयसी-बरा बाम दिके मनोहरा कनक-केशर-कान्ति धरे अनूरगे-रक्त शाडी नील-पट्ट मनोहारी मणिमोय आभरण परे
अर्थ

स्वर्ण-वर्णा श्री राधिका सबसे प्रिय और मनमोहक हैं, वे श्री कृष्ण के बाईं ओर बिराजी हैं। गहरे अनुराग से रंगी लाल साड़ी और उस पर मनोहर नीला दुपट्टा धारण करती हैं, और रत्नमय आभूषणों से सुशोभित हैं।

करये लोचन पाण रूप-लीला दूँहु ध्यान आनन्दे मगन सहचरी बेद-बिधि-अगोचर रतन-बेदीर पर सेब निति किशोर-किशोरी
अर्थ

सखियाँ अपनी आँखों से युगल के रूप और लीला का रस पीती हैं, उन्हीं का ध्यान करती हैं, और आनन्द में मग्न रहती हैं। रत्नों की वेदी पर विराजे किशोर-किशोरी, जिन तक वेद-विधि नहीं पहुँचती, उनकी वे नित्य सेवा करती हैं।

दूर्लभ जनम हेन नाहि भज हरि केन कि लागिया मर भव बँधे छाड अन्य क्रिया कर्म नाहि देख वेद-धर्म भक्ति कर कृष्ण-पद-द्वन्द्व
अर्थ

हे मन, यह दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर भी तुम हरि की भक्ति क्यों नहीं करते? किस कारण तुम संसार-बंधन में व्यर्थ कष्ट सहते हो? अन्य सभी कर्म और वैदिक कर्तव्यों को छोड़कर कृष्ण के चरण-युगल की भक्ति करो।

बिषय बिषम-गति नाहि भज ब्रज-पति श्री-नन्द नन्दन सूख-सार स्वर्ग आर अपबर्ग संसार नरक-भोग सर्ब-नाश जनम-बिकार
अर्थ

विषय-भोग के परिणाम अत्यंत भयानक हैं। हे मन, तुम व्रज के स्वामी श्री नन्दनन्दन की, जो सुख के सार हैं, भक्ति क्यों नहीं करते? स्वर्ग, मुक्ति और सांसारिक भोग की कामना नरक के समान है, ये सब इस मनुष्य-जन्म को व्यर्थ और नष्ट कर देते हैं।

देहे ना करिह आष्ठा सन्निकते जम शास्त दूःखेर समूद्र कर्म-गति देखिय शुनिय भज साधू-शास्त्र-मत यज जूगल-चरणे कर रति
अर्थ

इस नश्वर देह पर विश्वास मत करो, क्योंकि यमराज सदा समीप ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। कर्म की गति दुःख का सागर है। यह भली-भाँति समझकर, साधु और शास्त्र के अनुसार राधा-कृष्ण के युगल-चरणों में अनुराग करो।

कर्म-खान्द ज्ञान-खान्द केवल बिषेर भान्द अमृत बलिया जेबा खाय नाना जोनि सदा फिरे कदर् ज्य भक्षण करे तार जन्म अधः-पाते जाय
अर्थ

कर्म-काण्ड और ज्ञान-काण्ड केवल विष के पात्र हैं। जो इन्हें अमृत समझकर पीते हैं, वे अनेक योनियों में सदा भटकते रहते हैं और घृणित वस्तुओं का भक्षण करते हैं। उनका यह जन्म अधोगति को प्राप्त होता है।

राधा-कृष्णे नाहि रति अन्य जने बले पति प्रेम-भक्ति रीति नाहि जाने नाहि भक्तिर सन्धान भरमे करये ध्यान बृथा तार से छार जीबने
अर्थ

जिनका राधा-कृष्ण के प्रति अनुराग नहीं है, वे प्रेम-भक्ति की विधि को न जानते हुए किसी अन्य को ही अपना स्वामी मान लेते हैं। उन्हें भक्ति का कोई ज्ञान नहीं, वे केवल भ्रम में ध्यान करते हैं। उनका जीवन व्यर्थ और तुच्छ है।

ज्ञान कर्म करे लोक नाहि जाने भक्ति-योग नाना-मते हैया अज्ञान तार कथा नाहि शुनि परमार्थ-तत्त्व जानि प्रेम-भक्ति भक्त-गण-प्राण
अर्थ

कम बुद्धि वाले लोग कर्म और ज्ञान में लगे रहते हैं, वे भक्ति-योग को नहीं जानते और विभिन्न मतों में भ्रमित रहते हैं। उनकी बातें मत सुनो, बल्कि यह निश्चित जानो कि प्रेम-भक्ति ही भक्तों का प्राण है।

जगत्-ब्यापक हरि अज-भव आज्ञा-कारी मधूर मूरति लीला-कथा एइ तत्त्व जाने जेइ परम उत्तम सेइ तार सङ्ग करिब सर्बथा
अर्थ

भगवान हरि सर्वव्यापी हैं, और ब्रह्मा तथा शिव भी उनके आज्ञाकारी हैं, फिर भी उनका स्वरूप और लीला-कथा अत्यंत मधुर है। जो इस तत्त्व को जानता है, वही परम उत्तम भक्त है, और मैं सदा उसी का संग करूँगा।

परम नागर कृष्ण ताँहे हओ सतृष्ण भज ताँरे ब्रज-भाव लञा रसिक-भकत सङ्गे रहिब पिरीति-रङ्गे ब्रज-पूरे बसति करिया
अर्थ

कृष्ण परम नागर हैं, उनके प्रति सदा उत्कण्ठा रखो। व्रज-भाव को अपनाकर उनकी भक्ति करो। व्रज में निवास करते हुए रसिक भक्तों के संग प्रेम-रंग में सदा रहो।

श्री-गुरु-भकत-जन तान्हार चरणे मन आरोपिया कथा-अनूसारे सखीर सर्बथा मत हैया ताँहर जूथ सदाइ बिहरे ब्रज-पूरे
अर्थ

श्री गुरु और भक्तजनों के चरणों में अपना मन लगाओ, उनके वचनों का अनुसरण करो। सखियों के भाव में पूर्णतः रंग जाओ, और उनके समूह में सदा व्रज-धाम में विहार करो।

लीला-रस-कथा गण जूगल-किशोर प्राण प्रार्थना करिब अभिलासे जीबने मरणे एइ आर किछू नाहि चाइ कहे दीन नरोत्तम-दास
अर्थ

लीला-रस की कथाएँ और युगल-किशोर ही मेरे प्राण हैं। मैं बड़ी अभिलाषा से यही प्रार्थना करूँगा। जीवन हो या मृत्यु, इसके सिवा मुझे और कुछ नहीं चाहिए, दीन नरोत्तम दास ऐसा कहते हैं।