स्थिर प्रेम भक्ति
श्री वृन्दावन, जो राधा-कृष्ण की लीलाओं का स्थल है, शब्दों से परे है। यह स्वयं-प्रकाश है और घनीभूत प्रेमानंद से पूर्ण है। वहाँ सुख सदा प्रकट रहता है, वहाँ जरा और मृत्यु का दुःख नहीं है, और कृष्ण की लीला वहाँ निरंतर होती रहती है।
राधा-कृष्ण दोनों का प्रेम लाख बार तपाए सोने जैसा है, और उसकी लहरों में रस का सागर उमड़ता है। उनके नयन चकोर की तरह प्रेम-रस पीते रहते हैं। कामदेव और रति सदा इसी प्रेम का ध्यान करते हैं। दोनों प्रीति के सुख के बन्धु हैं।
स्वर्ण-वर्णा श्री राधिका सबसे प्रिय और मनमोहक हैं, वे श्री कृष्ण के बाईं ओर बिराजी हैं। गहरे अनुराग से रंगी लाल साड़ी और उस पर मनोहर नीला दुपट्टा धारण करती हैं, और रत्नमय आभूषणों से सुशोभित हैं।
सखियाँ अपनी आँखों से युगल के रूप और लीला का रस पीती हैं, उन्हीं का ध्यान करती हैं, और आनन्द में मग्न रहती हैं। रत्नों की वेदी पर विराजे किशोर-किशोरी, जिन तक वेद-विधि नहीं पहुँचती, उनकी वे नित्य सेवा करती हैं।
हे मन, यह दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर भी तुम हरि की भक्ति क्यों नहीं करते? किस कारण तुम संसार-बंधन में व्यर्थ कष्ट सहते हो? अन्य सभी कर्म और वैदिक कर्तव्यों को छोड़कर कृष्ण के चरण-युगल की भक्ति करो।
विषय-भोग के परिणाम अत्यंत भयानक हैं। हे मन, तुम व्रज के स्वामी श्री नन्दनन्दन की, जो सुख के सार हैं, भक्ति क्यों नहीं करते? स्वर्ग, मुक्ति और सांसारिक भोग की कामना नरक के समान है, ये सब इस मनुष्य-जन्म को व्यर्थ और नष्ट कर देते हैं।
इस नश्वर देह पर विश्वास मत करो, क्योंकि यमराज सदा समीप ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। कर्म की गति दुःख का सागर है। यह भली-भाँति समझकर, साधु और शास्त्र के अनुसार राधा-कृष्ण के युगल-चरणों में अनुराग करो।
कर्म-काण्ड और ज्ञान-काण्ड केवल विष के पात्र हैं। जो इन्हें अमृत समझकर पीते हैं, वे अनेक योनियों में सदा भटकते रहते हैं और घृणित वस्तुओं का भक्षण करते हैं। उनका यह जन्म अधोगति को प्राप्त होता है।
जिनका राधा-कृष्ण के प्रति अनुराग नहीं है, वे प्रेम-भक्ति की विधि को न जानते हुए किसी अन्य को ही अपना स्वामी मान लेते हैं। उन्हें भक्ति का कोई ज्ञान नहीं, वे केवल भ्रम में ध्यान करते हैं। उनका जीवन व्यर्थ और तुच्छ है।
कम बुद्धि वाले लोग कर्म और ज्ञान में लगे रहते हैं, वे भक्ति-योग को नहीं जानते और विभिन्न मतों में भ्रमित रहते हैं। उनकी बातें मत सुनो, बल्कि यह निश्चित जानो कि प्रेम-भक्ति ही भक्तों का प्राण है।
भगवान हरि सर्वव्यापी हैं, और ब्रह्मा तथा शिव भी उनके आज्ञाकारी हैं, फिर भी उनका स्वरूप और लीला-कथा अत्यंत मधुर है। जो इस तत्त्व को जानता है, वही परम उत्तम भक्त है, और मैं सदा उसी का संग करूँगा।
कृष्ण परम नागर हैं, उनके प्रति सदा उत्कण्ठा रखो। व्रज-भाव को अपनाकर उनकी भक्ति करो। व्रज में निवास करते हुए रसिक भक्तों के संग प्रेम-रंग में सदा रहो।
श्री गुरु और भक्तजनों के चरणों में अपना मन लगाओ, उनके वचनों का अनुसरण करो। सखियों के भाव में पूर्णतः रंग जाओ, और उनके समूह में सदा व्रज-धाम में विहार करो।
लीला-रस की कथाएँ और युगल-किशोर ही मेरे प्राण हैं। मैं बड़ी अभिलाषा से यही प्रार्थना करूँगा। जीवन हो या मृत्यु, इसके सिवा मुझे और कुछ नहीं चाहिए, दीन नरोत्तम दास ऐसा कहते हैं।