गोकुल मङ्गल वंशी
गोकुल के लिए मंगलमय वंशी की ध्वनि वन चलने के लिए बुलाती हुई गरज उठती है। यह ध्वनि कामनाओं के राजा कामदेव के आदेश की घोषणा करती है।
'तुम यहाँ व्यर्थ ही, मेरे अंगों को सजाने के बहाने, यह बाधा क्यों उत्पन्न कर रही हो? मैं अभी इस नियत समय में और पल भर का भी विलम्ब सहन नहीं कर सकती।'
देखो, यह जो चन्द्रमा उदित हो रहा है, वह माधव के चरण के अँगूठे के नख की आभा है। बार-बार गुरुजनों का भय मत दोहराओ। मैं अब ऐसी हो गई हूँ कि मेरी लालसा तेज़ी से उन्हीं की ओर दौड़ रही है।
'देखो, वन में उपजी वस्तुओं के परम सुन्दर वेश वाले उस नित्य प्रभु की सेवा के लिए गोपांगनाओं का यह सारा समूह अब सूर्यपुत्री यमुना के तट की ओर बढ़ रहा है।'
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4