गोरा नाचे प्रेम बिनोदिया
प्रेम की क्रीड़ा करते हुए गौर नाचते हैं। सम्पूर्ण लोकों के स्वामी नदिया में विहार करते हैं।
नाचते-नाचते गौर को दिशा का ज्ञान नहीं रहता। उनके मुख का चन्द्रमा 'हरि' बोलता है, और वे रोते-रोते नाचते हैं।
गोलोक से लाये गये प्रेम-रस के धन को वे सब जीवों में उदारतापूर्वक बाँट देते हैं। 'हरिबोल' बोलते हुए गौर संकीर्तन में नाचते हैं।
प्रेम में उनका शरीर पुलकित हो उठता है। उनके मुख पर मधुर मुसकान छा जाती है। परन्तु हाय! बलराम दास उनकी सेवा के इस रस से वंचित रह गये।