हरि हरि ऐछे भाग्य होयब हामार
हरि! हरि! कब मैं भाग्यशाली बनूँगा? कब मैं गौर प्रभु को अपने पार्षदों के साथ नदिया में लीला करते देखूँगा?
कब मैं गंगा के तट पर कीर्तन में नृत्य का रस लेते अपने प्रभु को जी भरकर देखूँगा? कब मेरी यह बहुत पुरानी इच्छा पूरी होगी?
कब मैं गौर प्रभु को श्रीवास के घर में आसन पर बैठे देखूँगा? उनके दाहिने खड़े निताई प्रभु गौर प्रभु के मस्तक पर छत्र धारण करेंगे। गदाधर पण्डित गौर प्रभु के बाईं ओर खड़े होंगे।
जो कोई वहाँ जाएगा, वह गौर प्रभु के चन्द्रमुख के दर्शन करेगा। उसके रोम-रोम पुलकित हो उठेंगे। वह प्रेमानंद प्राप्त करेगा।
कब माता शची के बुलाने पर मुझे गौर प्रभु के भोजन का कई मुट्ठी प्रसाद मिलेगा? कब रामानंद आनंद से गौर प्रभु के दर्शन करेंगे? तब रामानंद के दोनों नेत्र सफल हो जाएँगे।