हरि हरि आर कि एमन दशा हबे
हरि! हरि! क्या कभी मुझे वह अवस्था प्राप्त होगी, जब 'गौरांग' नाम कहते ही मेरे रोम-रोम पुलकित हो उठेंगे?
कब 'निताई' कहते ही मेरे नेत्रों से अश्रु बहने लगेंगे? कब 'अद्वैत' कहते ही मैं आनंद-विह्वल हो जाऊँगा?
कब मैं 'चैतन्य! निताई! अद्वैत! हे मेरे स्वामी!' पुकारते-पुकारते मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ूँगा?
कब प्रभु का नाम सुनते ही मुझे चेत आएगा, मैं उठ खड़ा होकर 'गौरांग!' की गर्जना करूँगा?
श्री नन्दकुमार (भगवान कृष्ण) और श्रीमती वृषभानुसुता (श्रीमती राधारानी) ने वृन्दावन में अनेक लीलाएँ कीं।
कब मैं उन सब लीला-स्थलों को देखता ही रहूँगा? कब उनकी लीला का स्मरण करते हुए भूमि पर गिरकर रो पड़ूँगा?
कब मुझे श्री रासमंडल के दर्शन होंगे? कब वह लीला मेरे हृदय में साकार होकर मुझे मूर्छित कर देगी?
प्रेमदास कहते हैं: कब मैं संसार का त्याग करके गौरांग द्वारा दिखाए भक्ति-पथ पर चलूँगा? कब वह दिन आएगा?