हरि हरि निता इ कबे करुणा करिबे
हरि! हरि! कब निताई प्रभु मुझ पर कृपा करेंगे? कब सांसारिक वासनाएँ मुझसे दूर भाग जाएँगी?
कब भिखारी का वेश धारण करके मैं वृन्दावन में रहूँगा? कब मैं अपनी आँखों से श्याम-कुण्ड और राधा-कुण्ड के दर्शन करूँगा?
कब वंशीवट वृक्ष की छाया पाकर मेरा जीवन शीतल आनंद से भर जाएगा? कब गोवर्धन पर्वत के नीचे मैं भूमि पर लोटूँगा?
कब मैं माया के मोह से बने इस मानव शरीर को त्यागूँगा? कब गोपियों की अनुगामिनी का रूप पाकर युगल-चरणों की सेवा करूँगा?
कब मैं श्री रूप-मंजरी की शरण लूँगा? कब उनके पास खड़े होकर युगल-किशोर पर चामर ढुलाऊँगा?
कब मैं युगल-किशोर को एक ही आसन पर बैठाऊँगा? कब उन दोनों के गले में एक ही माला पहनाऊँगा?
कब भिखारी बनकर व्रज में विचरण करूँगा? कब घर-घर जाकर माधुकरी भिक्षा माँगकर खाऊँगा?
प्रेमदास कहते हैं: कब मैं इस प्रकार भाग्यशाली बनूँगा? कब 'गौरांग!' पुकारते हुए इस पाप-शरीर को त्यागूँगा?