लीला कारी जगन्नाथ
श्री जगन्नाथ लीलामय हैं। चलते-चलते उनका रथ आधा मार्ग तय होते ही अचानक रुक जाता है।
देवता, दैत्य और मनुष्य सब खींचते हैं, परन्तु रथ नहीं हिलता। हाथ में बेंत लिए परीछा और पुजारी तरह-तरह की गालियाँ देते हैं।
राजा के आदेश से दोनों ओर सैकड़ों-सैकड़ों हाथी जोत दिए जाते हैं। हाथी अपनी पूरी शक्ति से खींचते हैं, परन्तु रथ एक कदम भी नहीं हिलता।
पीछे जाकर श्री गौर राय अपना सिर रथ से लगाकर उसे धकेलते हैं। रथ तुरन्त हवा की गति से चल पड़ता है। पल भर में ऐसा लगता है मानो वह आठ सौ मील चला गया हो।
रथयात्रा के भक्तजन दोनों बाहें उठाकर पुकारते हैं, "जय गौर!" श्री जगन्नाथ और श्री गौर दोनों की दिव्य शक्ति को अपनी आँखों से देखकर यह यदु दास आश्चर्य से चकित हो जाता है।