लीलामृताख्य नाम दशक
जिनकी वंशी की ध्वनि, मधु की बाढ़ के समान, राधिका के हृदय को उन्मत्त कर देती है; जिनका मन राधा से उठती सुगन्ध के अपार भार से अभिभूत हो जाता है।
जिनकी विलास-चेष्टाएँ सुन्दरी राधा के मन-रूपी मछली को फँसाने वाला काँटा बन जाती हैं; जो प्रेम के अभिमान से अन्धी गान्धर्विका के मधुर, मिश्रित किलकिंचित भावों से मोहित हो जाते हैं।
जो चतुर ललिता की सलाह से प्रेरित राधा के बनावटी मान के वश में हो जाते हैं; जो राधा के छेड़छाड़ भरे वचनों की अमृत-सी मधुरता के आगे विवश होकर आसक्त हो जाते हैं।
जिनके मुखचन्द्र की चाँदनी से राधिका का प्रेम-सागर उमड़ उठता है; जो वृषभानु-नन्दिनी के कण्ठ की माला में शोभायमान मरकत मणि हैं।
जो चमेली से सुशोभित, खिली हुई राधिका के मुख-कमल पर मँडराने वाले भ्रमर हैं; जिनके वक्षस्थल पर राधिका के वक्षों से बना कस्तूरी का पत्र-चिह्न चमकता है।
गोकुल के राजा के पुत्र की लीलाओं से मनोहर इस नाम-दशक का जो पाठ करता है, वह उनका प्रिय बन जाता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 6