चिन्मय वृन्दावन में श्री कृष्ण और उनके पार्षद
हे लोगो, सुनिए। सुनिए। एक और दिन भगवान नारायण ने जो एक और लीला की, उसे बड़े ध्यान से सुनिए।
बारह वर्ष से चौदह वर्ष की आयु तक अपनी लीलाओं में कृष्ण बहुत सुन्दर हो गए।
अपनी किशोर और यौवन अवस्था में कृष्ण श्यामसुन्दर थे, जैसे वर्षा ऋतु का तेजस्वी बादल हो।
मैं उन सुन्दर परम पुरुषोत्तम भगवान का ध्यान करता हूँ, जो दिव्य जगत् में कल्पवृक्ष के नीचे विराजमान हैं।
उनके ऊपर एक सुन्दर पूर्णिमा का चन्द्रमा है।
उनके साथ सोलह सुन्दर गोपियाँ हैं, जिनमें राधा प्रमुख हैं।
उनकी बायीं ओर राधा हैं। दायीं ओर चन्द्रावली हैं। चारों ओर सुन्दर गोपियों की टोली पर टोली है।
राधा के प्रियतम कृष्ण के पीछे चिन्तामणि रत्नों का एक विशाल महल है, जिसके चार द्वार हैं।
चारों द्वारों पर चार ग्वाल द्वारपाल थे, जिनमें से हर एक भगवान कृष्ण के ही समान मनोहर और सुन्दर था।
पश्चिमी द्वार पर श्रीदामा द्वारपाल हैं। पूर्वी द्वार पर सुदामा द्वारपाल हैं। उत्तरी द्वार पर दामा द्वारपाल हैं।
दक्षिणी द्वार पर किंकिणीक द्वारपाल हैं। द्वारों के भीतर वृन्दावन है, जहाँ कृष्ण आनन्द से भरी अनेक लीलाएँ करते हैं।
करोड़ों-करोड़ों ग्वाल-बाल सुबल और दूसरे द्वारपालों की सहायता करते हुए चिन्तामणि रत्नों के महल की रक्षा करते हैं।
अनेक आभूषणों से सजे हुए, अनेक कलाओं के ज्ञाता और गले में वन-माला पहने ये ग्वाले स्वयं भगवान कृष्ण जैसे दिखाई देते हैं।
कोई श्याम वर्ण के हैं, तो कोई गौर वर्ण के। सभी भरे-पूरे यौवन में हैं। सभी के अंग तेजस्वी और शोभायमान हैं।
गुंजा की मालाएँ और मोर-पंख के मुकुट पहने हुए सभी ग्वाले मनोहर हैं और स्वयं भगवान कृष्ण जैसे सुन्दर हैं।
हर किसी की कमर पर भैंस के सींग का बिगुल है। एक हाथ में बाँसुरी है और दूसरे में छड़ी। हर कमर पर एक सुन्दर श्वेत वस्त्र शोभा दे रहा है।
कृष्ण जब आनन्दित होते हैं, तब सभी ग्वाले आनन्दित हो जाते हैं। वे ताली बजाते हुए मधुर स्वर में गीत गाते हैं।
वे कृष्ण की सेवा करते हैं। उनके हृदय कृष्ण को समर्पित हैं। उस महल में कृष्ण को घेरकर वे अनेक गीत गाते हैं।
चन्दन से सजे अंगों वाले और गले में वन-माला पहने नन्द के पुत्र कृष्ण उस महल में अनेक लीलाएँ करते हैं।
उनके सिर पर मोर-पंख है। हाथ में मनमोहक बाँसुरी है। उनके चंचल होंठों पर मधुर मुस्कान है।
व्रज की बालाओं से घिरे कृष्ण रसिक प्रेमियों के शिरोमणि हैं। गोपियाँ उनके लिए पंचम स्वर में मधुर गीत गाती हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गुणराज खान
- ग्रन्थ
- श्री कृष्ण विजय
- पद
- 21