श्री कृष्ण के सुन्दर रूप का वर्णन
भगवान कृष्ण की कृपा से वृन्दावन में रहने वाले गोप लोग रोग, शोक और भय के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे।
हर क्षण गोविन्द ने सबकी रक्षा की। पिछले हर जन्म के सारे पाप दूर फेंक दिए गए।
जब वे बारह वर्ष की आयु के हुए, तब कृष्ण अत्यन्त सुन्दर हो गए। उन्होंने सारे लोकों को मोहित कर लिया।
उनके कमल-मुख ने पूर्णिमा के चन्द्रमा को हरा दिया। उनके मनोहर नेत्रों ने खंजन पक्षियों को हरा दिया।
उनके घुँघराले केशों के ऊपर मोर-पंख था। उन्होंने माणिक और हीरों के कुण्डल पहने थे।
उनके वक्षःस्थल पर अनेक रंगों के फूलों की माला थी। उनके हाथों में सोने की अँगूठियाँ और कंगन थे।
उनके चरणों में नूपुर थे और सुन्दर मस्तक पर मुकुट था। बहुत से बालकों के साथ वे, जो समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी हैं, बछड़ों की रक्षा करते हुए अपना समय बिताते थे।
पीली धोती और वनमाला से सजा हुआ उनका शरीर ऐसा था, जैसे बिजली के साथ नया वर्षा-मेघ हो।
उनका मुख लीला-रत्नों के दर्पण जैसा शोभायमान था। उनके पसीने की बूँदें तारों की पंक्ति जैसी थीं।
कृष्ण को देखकर उन युवतियों का मन शान्त नहीं रहा। जब उन्होंने कृष्ण के चरणों का चिन्तन किया, तब गोपियाँ कामना से पीड़ित हो गईं।
उनके हृदय उत्कट कामना में जल रहे थे, भय और लज्जा चूर-चूर हो गए थे, और उन युवतियों ने अपने पतियों को छोड़ दिया।
दिन-रात वे युवतियाँ कृष्ण का ही चिन्तन करती थीं। वे अपने घर के कामों के बारे में सोच नहीं पाती थीं।
वे सोचती थीं, “कृष्ण कहाँ हैं? उनके दर्शन पाने के लिए मैं क्या करूँ?”
इस तरह कृष्ण का चिन्तन करते हुए वे उन्हें अपने हृदयों में निवास करते हुए देख सकती थीं।
उनके हृदयों की बात जानकर कृष्ण अपनी योगमाया शक्ति प्रकट करेंगे और वृन्दावन के वन में उनके साथ रास-नृत्य की लीला का आनन्द लेंगे।
सुन्दर कृष्ण यमुना के किनारे चले, जहाँ वृक्षों और लताओं पर बहुत से फूल खिले थे।
हे लोगो, एकाग्र मन से सुनिए। गुणराज खान भगवान कृष्ण के चरणों का वर्णन कर रहे हैं, ऐसा वर्णन जो हमें जन्म और मृत्यु के संसार से उबार लेता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गुणराज खान
- ग्रन्थ
- श्री कृष्ण विजय
- पद
- 17