माधव परिहर मे पटम्
हे माधव, मेरा वस्त्र छोड़ दो; मैं शीघ्र ही अपने घर जा रही हूँ।
शुद्ध सतीत्व का व्रत ही मेरा धन है, और मेरा हृदय पूरी तरह निर्मल है।
तुम यह अनुचित ठिठोली क्यों कर रहे हो, जिसका सहारा कोई सज्जन कभी नहीं लेता?
यदि मुझे यह पता होता कि तुम, अपना रूप इस प्रकार छिपाए, यहाँ नदी-तट पर हो...
...तो मैं इतनी दूर से सांझ के समय सूर्य-पुत्री यमुना के समीप क्यों आती?
मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ, अब यह टेढ़ा व्यवहार छोड़ दो।
उस सनातन, उचित मार्ग का पालन करो, जो धर्मात्माओं को प्रिय है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 7