माधव परिहर पटिम तरङ्गम्
हे माधव, अपनी इस चतुराई भरी लहर को त्याग दो, ऐसा कौन है जो तुम्हारी चाल न जानता हो?
जाओ, अपने ही हृदय में बसी उस स्त्री को, अपनी प्रिया को, आनन्दित करो।
अब तुम्हारी इस अपराधिनी राधिका से क्या लाभ?
तुम्हारी आँख तो पहले ही नींद से झुक रही है, अब जाओ, घड़ी भर शय्या पर विश्राम करो।
भरपूर लेप लगा लो, जिससे तुम्हारे शरीर पर बने नखक्षतों का यह जाल मिट जाए।
यहाँ, अपनी बातूनी सखियों की पंक्ति के बीच, एक युवती अब भी तुम्हारे प्रेम में आनन्दित है।
हे सनातन प्रभु, मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ, अब इस आँगन में और विलम्ब मत करो।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 7