नाचत गौर निखिल नट पण्डित निरुपम भङ्गी मदन मद हर इ
नृत्य के परम विद्वान पण्डित भगवान गौर अपनी अनुपम भाव-भंगिमाओं से नृत्य करते हैं, जो कामदेव के गर्व को हर लेती हैं। भगवान गौर के अंगों की कान्ति, जो सूर्य के गर्व को भी चूर कर देती है, समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर देती है।
उनकी गर्जना क्रोधित सिंहों को भी परास्त कर देती है। उस गर्जना को सुनकर बलवान कलियुग भय से स्तब्ध हो जाता है। अपने अधीर नृत्य में वे बार बार उछलते हैं। उनके चरणों के भार से पृथ्वी कांप उठती है।
उनके सहचर आनंद से अमृत-सम गीत गाते हैं, ऐसे गीत जो किन्नरों के गर्व को छोटा कर देते हैं। खोल और खमक ढोल अनेक प्रकार से मधुर स्वर में बजते हैं। उनकी मधुर ध्वनि आकाश को स्पर्श करती है। ऐसे में कौन शांत और अविचल रह सकता है?
डर से काँपते हुए बलवान दुर्जन भगवान् गौर के चरणों की शरण लेते हैं। नरहरि के स्वामी कीर्तन की ध्वनि से सारे लोक भर देते हैं। वे सबसे दुर्लभ धन इस संसार को खुले हाथों भेंट में देते हैं।