नाचत नीके गौर बर रतन
गौर नामक अनुपम रत्न सुन्दरता से नाचते हैं। वे भक्तों के लिये कल्पतरु हैं, और कलियुग में आनन्द के सागर का मन्थन करते हैं।
वे प्रेम के भाव से विभोर हैं। उनके शरीर के रोम खड़े हैं। वे गोपनीय प्रेम-रस के अमृत-सागर में डूबे हुए हैं।
भाव-विभोर होकर उनके नेत्रों से आँसू झरते हैं। वे बिना रुके निरन्तर 'हरि! हरि!' बोलते रहते हैं।
वे बार-बार धरती पर गिर पड़ते हैं। वे कितने विभोर हैं! उनके कोमल, सुन्दर, लाल तलवे फूलों के समान हैं।
ब्रह्मा, शिव और सभी देवता निरन्तर उनका ध्यान करते हैं। परन्तु हाय! कवि-शेखर उनकी सीधी सेवा के मधुर रस का आस्वादन नहीं कर सके।