नाचे शचीर दुलाल रङ्गे
अद्वैत आचार्य, निताई प्रभु, गदाधर, श्रीवास तथा अन्य अनेक सहचरों से घिरे हुए शची के पुत्र आनंदपूर्वक नृत्य करते हैं।
उनके अंग कैसी मधुर सुंदरता से हिलते हैं! उनके अधीर नाचते चरण पृथ्वी की सतह को स्पर्श करते हैं। अब कौन शांत और स्थिर रह सकता है?
करताल अनेक प्रकार की तालों में बजते हैं। गोविन्द, माधव और वासु प्रभु की महिमा का गान करते हैं। चारों दिशाएं महिमा से भर जाती हैं।
भगवान गौर के मुखचन्द्र से हरि! की पुकार निकलती है। जगाई और माधाई को देखकर भगवान गौर उन्हें अपनी बाहों में भर लेते हैं।
भगवान गौरचन्द्र के स्पर्श से जगाई और माधाई प्रेमभाव से भर जाते हैं। अपनी बाहें उठाकर वे नृत्य करने लगते हैं।
फिर वे भूमि पर लोटने लगते हैं। वे कांपते हैं। उनके रोम रोम पुलकित हो उठते हैं। उनकी आंखों से अश्रु बहने लगते हैं।
भगवान गौर की कृपा का यह प्रकाश देखकर देवगण आकाश में नृत्य करते हैं। उनकी आंखें शीतल आनंद से भर जाती हैं।
भगवान गौर की कृपा पाने के लिए कौन नहीं दौड़ेगा? सारा संसार जय! जय! की ध्वनि से भर जाता है। यह घनश्याम दास कहते हैं।