नदीया आकाशे सङ्कीर्तन मेघ साजे
खोल और करताल की गंभीर गड़गड़ाहट से भरे हुए संकीर्तन के मेघ नदिया के आकाश में छा गए हैं।
बार-बार बादल गरजते हैं और बिजली गिरती है। दो बादल, चैतन्य महाप्रभु और नित्यानन्द प्रभु, पवित्र नामों की भारी वर्षा करते हैं।
दोनों प्रभु रुक-रुक कर अपने सखाओं के साथ गान और नृत्य करते हैं। प्रेम की बिजली की चमक सभी को विस्मित कर देती है।
प्रेम की भारी वर्षा से बड़ी बाढ़ आ जाती है। सारा शान्तिपुर उस जल में तैरने लगता है। परन्तु हाय! अनन्त राय का हृदय उस उमड़ते अमृत-जल में नहीं बहा।
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