Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

नित्य-धाम वृन्दावन

नित्य-धाम वृन्दावन, यथा मोर कृष्ण-धन नित्य-काल करेन विलास चिदानन्दमय लता, प्रेम-किसलय यथा ज्ञानानन्दमय कुञ्ज-वास
अर्थ

मेरे धन, श्रीकृष्ण, नित्य धाम वृन्दावन में सदा लीला-विलास करते हैं। वे वहाँ के कुंजों में निवास करते हैं, जो दिव्य ज्ञान से भरे हैं और चिन्मय लताओं तथा दिव्य प्रेम की कलियों से सजे हैं।

सु-निर्मल उपासना, कालिन्दिते विभावना यथा सदा भक्तेर हृदये जीवेर ये उछ्ह-भाव, गोवर्धन आविर्भाव चरे जीव गाभि-रूप हये
अर्थ

सबसे शुद्ध उपासना कालिन्दी के तट पर प्रकट होती है और वहाँ भक्तों के हृदय में सदा विद्यमान रहती है। जीवों को प्राप्त होने वाला सर्वोच्च भाव गोवर्धन पर प्रकट होता है, जहाँ गाय आदि पशु रहते हैं।

सखी-भाव भ्रातृ-भाव, यथा सदा नित्य-भाव आनन्द याहार मात्र अङ्ग काम द्वेश आदि यत, नाहि यथा कोन मत प्रेम-रूप रस मात्र रङ्ग
अर्थ

वहाँ नित्य भाव सखियों के भाव और भाइयों जैसे स्नेह का है, और आनन्द ही वहाँ का एकमात्र धन है। वहाँ काम, द्वेष आदि या उस प्रकार का कुछ भी नहीं है, केवल दिव्य प्रेम के रसों की ही लीला होती है।

दास्य सख्य सु-मधुर, वात्सल्यादि रस-पुर व्रज-धाम प्रेमेर आलय? जन्म मृत्यु शोध रोग, नाहि तथा करे भोग प्रेमामृत जीवेर आश्रय
अर्थ

वह धाम दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर रसों से भरा है। सचमुच, व्रज-धाम दिव्य प्रेम का घर है। वहाँ जीव जन्म, मृत्यु, कष्ट या रोग का अनुभव नहीं करते। वे प्रेम के अमृत का आश्रय लेते हैं।

अभौतिक अतीन्द्रिय, सेइ देश कृष्ण-प्रिय देश-काल अतीत सर्वदा भूतमय देह लये, जडासक्त चित्त ह’ये केह ना याइते पारे तथा
अर्थ

वह भूमि, जो कृष्ण को अत्यन्त प्रिय है, भौतिक पदार्थ और सभी लौकिक इन्द्रिय-अनुभवों से परे है। वह सदा देश और काल से परे रहती है। जिसकी देह भौतिक है और जिसका मन जड़ पदार्थ में आसक्त है, वह वहाँ कभी नहीं पहुँच सकता।

सेइ जीव भाग्यावन, पाइयछे सुसन्धान गुरु-कृष्ण प्रसन्नताश्रये मनोमय भूतमय, देहे करि’ पराजय याय सेइ आनन्द निलये
अर्थ

जिन जीवों ने श्रीगुरु और कृष्ण का प्रसन्नतापूर्ण आश्रय पा लिया है, वे परम भाग्यशाली हैं। वे मानसिक और भौतिक देह को पार करके उस आनन्द-धाम को प्राप्त करते हैं।

अप्राकृत देह पाइ, व्रजेर निकट याइ सखी-पद करिया आश्रय राधा-कृष्ण सेवा-सुख, भूञ्जि सब याय दुःख महा-भाव पर्यन्त उदय
अर्थ

वे दिव्य देह पाकर व्रज में प्रवेश करते हैं और सखियों के चरणों का आश्रय लेते हैं। वे राधा-कृष्ण की सेवा में सुख पाते हैं, सारे दुःख पीछे छोड़ देते हैं और महाभाव की अवस्था तक उठ जाते हैं।

अतएव बन्धु-जन, छल याइ वृन्दावन अति दूर नहे सेइ देश इन्द्रिय संयम धरि, अन्तरे प्रवेश करि’ समाधि लभिबे अवशेष
अर्थ

इसलिए, हे मित्रो, आइए हम वृन्दावन चलें! वह भूमि बहुत दूर नहीं है। अपनी इन्द्रियों को वश में कीजिए, भीतर प्रवेश कीजिए, और अन्त में आप समाधि प्राप्त करेंगे।

भूत-भाव देश काल, विरमिले किछु-काल आत्मार दहर विकशिबे सेइ भूमि वृन्दावन, जान ओहे साधु-जन यथा राधा-गोविन्द देखिबे
अर्थ

कुछ समय तक भौतिक देश और काल का हमारा अनुभव बना रह सकता है, पर उस भूमि से आत्मा का अन्तरंग सम्बन्ध धीरे-धीरे विकसित होगा। हे साधुजनो! जानिए कि वृन्दावन वही भूमि है जहाँ आप अन्ततः राधा-गोविन्द के दर्शन करेंगे।

तथा केलि कुतूहले, पशिबे यमुना जले सखी-सह राधिका सेवाय राधिका जीवनेश्वरी, कृष्ण-प्रिया सर्वेश्वरी प्रेम-वाक्य कहिबे तोमाय
अर्थ

वहाँ आप बड़े उल्लास के साथ यमुना के जल में प्रवेश करेंगे और श्रीराधिका की सेवा करते हुए सखियों के साथ क्रीड़ा करेंगे। जीवों की स्वामिनी, कृष्ण की परम प्रिया और सबकी ईश्वरी राधिका आपसे प्रेम-भरे वचन कहेंगी।

शुनिबे गोविन्द वंशी, जीवेर हृदय दंशि भूवन माताय यार रबे पुलक कदम्ब-तले, तोमाय आनिबे बले डुबाइबे प्रेमेर आसबे
अर्थ

आप गोविन्द की वंशी की ध्वनि सुनेंगे, जो जीव के हृदय को बेध देती है और सारे जगत् को उन्मत्त कर देती है। वह आपको बलपूर्वक खिले हुए कदम्ब वृक्ष के नीचे ले जाएगी और आप दिव्य प्रेम के अमृत में डूब जाएँगे।

पशिले यमुना जले, प्रेम-ज्वाला आरो ज्वले धडफडि उठिबे तखन पुलिने आगत हये, कृष्ण-रूप निरखिये एक-बारे ह’बे अचेतन
अर्थ

यमुना के जल में प्रवेश करते ही प्रेम की अग्नि और भी तीव्र होकर जलेगी और आपका हृदय धड़कने लगेगा। तट पर लौटकर आप कृष्ण का रूप देखेंगे और अचानक अचेत हो जाएँगे।

हेन वृन्दावन-धाम, सर्व-जीव अभिराम छडि येइ याय अन्य स्थान ता’र सम मूर्ख नाइ, चिन्ता करि’ देख भाइ यदि पाओ प्रेमेर सन्धान
अर्थ

श्रीवृन्दावन-धाम सभी जीवों को आनन्द देता है। जो वृन्दावन छोड़कर कहीं और जाता है, उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं। भाई, इस पर विचार कीजिए! दिव्य प्रेम आपको और कहीं नहीं मिलेगा।

कामिनीर सह-वास, गल्प आदि परिहास मद्य कुम्भ अलङ्कार चय सकलि दुःखेर मूल, सुख बलि तव भूल एइ बेला बुझह निश्चय
अर्थ

स्त्रियों के साथ रहना, हँसी-मज़ाक, किस्से-कहानियाँ, मदिरा की बोतलें, गहने आदि सारे दुःखों की जड़ हैं। इन्हें सुख मानना आपकी भूल है। इस बात को बहुत स्पष्ट रूप से समझ लीजिए।

देहे ज्वरा प्रवेशिया, काँपाइबे तव हिया कफे कण्ठ परिपूर्ण ह’बे शुनिते ना पा’बे काने, नासिका अक्षम घ्राणे निरस्त हैया चक्षु र’रे
अर्थ

शरीर में ज्वर घुसकर आपको कँपा देगा। आपका कण्ठ कफ से भर जाएगा। आपके कान सुन नहीं पाएँगे, नाक सूँघ नहीं पाएगी और आँखें भी काम नहीं करेंगी।

प्रिय बन्धु यारे जन, से तोमार ह’बे आन अङ्गज करिबे अवहेला द्वारे प्रतिहारि प्राय, राखिबे तोमारे हाय बालकेर ह’बे तुमि खेला
अर्थ

जिन्हें आप अपने सबसे प्रिय मित्र समझते हैं, वे पराए जैसे हो जाएँगे। आपके परिवार वाले आपसे मुँह मोड़ लेंगे। वे द्वारपाल की तरह आपको दरवाज़े पर रोक देंगे और उनके बच्चे आपका मज़ाक उड़ाएँगे।

पूर्व ये प्रियसी तव, एबे घृणा करे सब सुरा सुख नाहि देय आर ये अस्थि चर्विया सुख, पाइबे से एबे दुःख दन्त-हीने दितेछे अपार
अर्थ

आपकी सारी पुरानी प्रेमिकाएँ आपसे घृणा करेंगी। मदिरा अब आपको कोई सुख नहीं देगी। जिन हड्डियों को चबाकर आप मज़ा लेते थे, वे अब आपको अपार दुःख देंगी, क्योंकि आपके दाँत नहीं रहेंगे।

अलङ्कार परिधाने, आर शोभा नाहि माने एबे मूर्ति मर्कट समान कोथा से दर्पण-राज, कोथा से तोमाय साज चिन्ति’ कर वैराग्य विधान
अर्थ

गहने पहनने से अब आप सुन्दर नहीं दिखेंगे, और आपका शरीर वानर जैसा दिखेगा। कहाँ गया आपका वह भव्य दर्पण और साज-सज्जा? इस पर विचार कीजिए और वैराग्य अपनाइए।

अतएव एइ-क्षने, चल भाइ वृन्दावने नित्य-सुख पाइबे तथाय कृष्ण-प्रेम नित्य-सुख, कभु नाहि देय दुःख अच्युत पदपि याते पाय
अर्थ

इसलिए, भाई, आइए अभी वृन्दावन चलें! वहाँ आपको नित्य सुख मिलेगा। कृष्ण के प्रति दिव्य प्रेम नित्य है और कभी कोई दुःख नहीं देता। उससे आप दोषरहित हो जाएँगे।

तव अप्राकृत देह, वृन्दावने पाबे गेह जड-देह जडेते रहिबे पञ्चत्व आपन्न ह’ले, देह रबे एइ स्थले तुमि व्रज कभु ना छाडिबे
अर्थ

आपको दिव्य देह और वृन्दावन में निवास मिलेगा। आपकी जड़ देह भौतिक जगत् में ही रह जाएगी। जब आपकी मृत्यु होगी, तब पंचतत्त्वों से बनी आपकी देह यहीं रह जाएगी, पर आप व्रज को कभी नहीं छोड़ेंगे।

कहे केदर्नाथ दत्त, एइ वृन्दावन-तत्त्व गुरु मोर चैतन्य गोसाइ तार दास सङ्ग ह’ले, जडे चित्त नाहि छले चैतन्य आश्रय कर भाइ
अर्थ

इस प्रकार केदारनाथ दत्त वृन्दावन का तत्त्व बताते हैं। मेरे गुरु चैतन्य गोसाईं हैं। जब आप उनके दासों का संग करेंगे, तो आपका मन कभी जड़ पदार्थ की ओर नहीं भटकेगा। हे भाई, श्रीचैतन्य का आश्रय लीजिए!

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